भारतीय दर्शन के अनुसार योग – अष्टांग योग का वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व (2026 अपडेट)
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परिचय
योग भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहर है, जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का विज्ञान माना जाता है। संस्कृत में योग शब्द का अर्थ है जोड़ना, अर्थात आत्मा का परमात्मा से मिलन, मन का शांति से मिलन और जीवन का संतुलन से जुड़ना। भारतीय दर्शन में योग केवल व्यायाम नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन पद्धति है।
महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग दर्शन भारतीय षड्दर्शनों में एक महत्वपूर्ण दर्शन है। इसका मुख्य उद्देश्य चित्तवृत्तियों का निरोध करके आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति कराना है।
योग क्या है?
योग वह साधना है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को अनुशासित करता है। यह तनाव, भय, क्रोध, अशांति और अज्ञान को दूर कर व्यक्ति को संतुलित, स्वस्थ और जागरूक बनाता है।
आज के आधुनिक युग में योग की उपयोगिता और भी बढ़ गई है, क्योंकि यह तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य देता है।
भारतीय दर्शन में योग का महत्व
भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य के दुखों का कारण अविद्या (अज्ञान) है। जब व्यक्ति आत्मा और शरीर के अंतर को नहीं समझता, तब वह मोह, लोभ, क्रोध और बंधन में फंस जाता है।
योग व्यक्ति को सिखाता है—
- आत्मा और शरीर का भेद समझना
- इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना
- मन को स्थिर करना
- आत्मज्ञान प्राप्त करना
- मोक्ष की ओर बढ़ना
अष्टांग योग क्या है?
महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंग बताए हैं, जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है।
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
1 यम – सामाजिक अनुशासन
यम का अर्थ है बुराइयों से बचना और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना।
पाँच यम
- अहिंसा – किसी को दुख न देना
- सत्य – सत्य बोलना
- अस्तेय – चोरी न करना
- ब्रह्मचर्य – इन्द्रिय संयम
- अपरिग्रह – लोभ न करना
यम मनुष्य के चरित्र को श्रेष्ठ बनाते हैं।
2 नियम – व्यक्तिगत अनुशासन
नियम का अर्थ है अच्छे आचरण का पालन करना।
पाँच नियम
- शौच – बाहरी और आंतरिक शुद्धि
- संतोष – जो मिले उसमें संतुष्टि
- तप – कठिनाइयों को सहना
- स्वाध्याय – ज्ञान प्राप्त करना
- ईश्वर प्रणिधान – ईश्वर में श्रद्धा रखना
3 आसन – शरीर की स्थिरता
आसन का अर्थ है शरीर को स्थिर और सुखपूर्वक रखना।
आज प्रचलित योगासन जैसे—
- पद्मासन
- वज्रासन
- ताड़ासन
- भुजंगासन
- शवासन
आसन शरीर को स्वस्थ, लचीला और रोगमुक्त बनाते हैं।
4 प्राणायाम – श्वास का नियंत्रण
प्राणायाम श्वास को नियंत्रित करने की कला है।
प्रकार
- पूरक – श्वास लेना
- कुम्भक – श्वास रोकना
- रेचक – श्वास छोड़ना
प्राणायाम से फेफड़े मजबूत होते हैं, तनाव कम होता है और मन शांत रहता है।
5 प्रत्याहार – इन्द्रियों का नियंत्रण
जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन के अधीन कर लेता है, उसे प्रत्याहार कहते हैं।
यह अवस्था कठिन है, लेकिन अभ्यास से संभव है।
6 धारणा – एकाग्रता
किसी एक विषय, बिंदु या लक्ष्य पर मन को स्थिर करना धारणा है।
आज की भाषा में इसे फोकस कहा जा सकता है।
7 ध्यान – निरंतर चिंतन
जब मन लगातार एक ही विषय में लगा रहे और विचलित न हो, वह ध्यान है।
ध्यान से—
- मानसिक शांति मिलती है
- तनाव कम होता है
- स्मरण शक्ति बढ़ती है
- आत्मविश्वास बढ़ता है
8 समाधि – परम अवस्था
समाधि योग की अंतिम अवस्था है। इसमें साधक स्वयं को भूलकर परम सत्य में लीन हो जाता है।
यह आत्मज्ञान और मोक्ष की अवस्था मानी जाती है।
बहिरंग और अंतरंग योग
बहिरंग साधन
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
अंतरंग साधन
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
आधुनिक जीवन में योग का महत्व
आज योग केवल धार्मिक साधना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जीवनशैली बन चुका है।
योग के लाभ
- तनाव दूर करता है
- मधुमेह नियंत्रण में सहायक
- हृदय स्वास्थ्य बेहतर
- एकाग्रता बढ़ाता है
- नींद सुधारता है
- मानसिक शांति देता है
- रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है
United Nations ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया है।
निष्कर्ष
भारतीय दर्शन के अनुसार योग केवल शरीर मोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने का मार्ग है। यह जीवन को अनुशासन, शांति, स्वास्थ्य और मोक्ष की दिशा देता है। यदि मनुष्य नियमित योग करे, तो वह बाहरी और आंतरिक दोनों जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
लेखक – बद्री लाल गुर्जर

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