भूमिका मनुष्य की भावनाओं में क्रोध एक स्वाभाविक और सामान्य भावना है। यह तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति को किसी प्रकार की असंतुष्टि, अपमान, अन्याय या असफलता का अनुभव होता है। लेकिन जब यह क्रोध व्यक्ति के विवेक, शांति और व्यवहार पर हावी हो जाता है तब यह विनाशकारी रूप ले लेता है। क्रोध पर नियंत्रण केवल आत्मसंयम नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक और मानसिक साधना है। यह हमें न केवल दूसरों के साथ बल्कि अपने भीतर के तूफ़ान से भी सामंजस्य स्थापित करना सिखाता है। 1 क्रोध की प्रकृति को समझना क्रोध एक ऊर्जा है। यह ऊर्जा नकारात्मक दिशा में जाए तो विनाश करती है और सकारात्मक दिशा में जाए तो साहस और न्याय का प्रतीक बन जाती है। क्रोध के तीन रूप देखे जाते हैं- क्षणिक क्रोध – जो कुछ समय के लिए आता है और शान्त हो जाता है। द्वेषपूर्ण क्रोध – जिसमें व्यक्ति किसी के प्रति लम्बे समय तक नफरत या विरोध रखता है। प्रतिक्रियात्मक क्रोध – जो अचानक किसी स्थिति में बिना सोचे-समझे प्रकट होता है। पहला रूप सामान्य है पर दूसरा और तीसरा रूप विनाशक है। क्रोध को समझना उसके कारणों को पहचानना ही नियंत्रण क...
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