भूमिका- आज का युग गति प्रतिस्पर्धा और कोलाहल का युग है। सुबह से लेकर रात तक इंसान किसी न किसी शोर में घिरा हुआ है कभी मोबाइल की घंटियाँ, कभी सड़क का ट्रैफिक, कभी समाचार चैनलों की बहसें तो कभी मन के भीतर चलने वाला विचारों का शोर। यह शोर केवल कानों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारी चेतना हमारे मानसिक संतुलन और हमारे जीवन की दिशा तक को प्रभावित करता है। हम धीरे-धीरे इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शांति हमें असहज लगने लगी है। जब कोई बाहरी शोर नहीं होता, तब भीतर के विचारों की गूंज हमें बेचैन कर देती है। इसी बेचैनी से निकलने की यात्रा ही है बाहरी शोर से भीतर की शांति तक की यात्रा। 1 शोर का मनोवैज्ञानिक प्रभाव- शोर केवल ध्वनि नहीं है यह एक ऊर्जा है जो हमारी तंत्रिका प्रणाली को प्रभावित करती है। वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि लगातार शोर में रहने वाले लोगों में तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप अनिद्रा चिड़चिड़ापन चिंता और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं। लेकिन इससे भी गहरा असर है मन की थकान। जब हम लगातार बाहरी शोर के बीच रहते हैं तो मन को आ...
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