प्रस्तावना मनुष्य का जीवन केवल सांस लेने खाने-पीने और जीने का नाम नहीं है। जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य स्वयं को जानना है यह जानना कि मैं कौन हूँ मेरा अस्तित्व क्या है और इस सृष्टि में मेरा क्या स्थान है। जब मनुष्य इस प्रश्न का उत्तर खोजने लगता है तब वह आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। आत्म-ज्ञान कोई बाहरी उपलब्धि नहीं है यह तो अपने भीतर छिपे उस प्रकाश को पहचानना है जो अज्ञान के पर्दे के पीछे छिपा होता है। जिस दिन मनुष्य स्वयं को जान लेता है उस दिन उसके सारे भ्रम, दुख और भय समाप्त हो जाते हैं। आत्म-ज्ञान का वास्तविक अर्थ आत्म-ज्ञान का अर्थ है स्वयं के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान । यह केवल यह जानना नहीं कि मैं एक शरीर हूँ या मैं एक मन हूँ बल्कि यह समझना कि मैं उस चेतना का अंश हूँ जो इस पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। संस्कृत में आत्मा का अर्थ है स्वयं और ज्ञान का अर्थ है बोध या समझ । इस प्रकार आत्म-ज्ञान का अर्थ हुआ अपने वास्तविक स्वरूप का बोध । गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। अर्थात् जब आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है तब अज्ञान रूपी ...
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