प्रस्तावना- मनुष्य का मन हमेशा सक्रिय रहता है कभी विचारों से भरा, कभी भावनाओं से तो कभी अनुभवों से। इस गति में कई बार हम खुद से सवाल भी करते हैं और खुद को कठोरता से जज भी करते हैं। यही स्थिति दो महत्वपूर्ण मानसिक प्रक्रियाएं बनाती है- आत्म-चिंतन और आत्म-आलोचना । दोनों दिखने में समान लगते हैं पर इनका असर पूरी तरह विपरीत होता है। एक प्रक्रिया मन को मजबूत बनाती है दूसरी प्रक्रिया मन को कमजोर कर देती है। इन दोनों का सही अंतर समझना मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास और भावनात्मक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह लेख इन्हीं दो प्रक्रियाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1 आत्म-चिंतन क्या है? आत्म-चिंतन वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति- अपने विचारों, भावनाओं, अनुभवों को बिना जज किए , बिना आरोप लगाए शांति से समझने की कोशिश करता है। यह स्वयं को देखने की आत्म-प्रकाशित प्रक्रिया है। जैसे साफ दर्पण में चेहरा देखने से वास्तविक रूप दिखता है, उसी तरह आत्म-चिंतन मन का दर्पण है। 2 आत्म-चिंतन के मुख्य गुण शांत मानसिकता विश्लेषण की क्षमता गलतियों को बिना डर स्वीकार करना सीखने की प्...
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