अन्य लेख पढ़ें


ध्यान करते समय मन क्यों भटकता है?

ध्यान करते हुए व्यक्ति का चित्र

ध्यान करते हुए व्यक्ति का चित्र

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

परिचय

ध्यान आत्मा की गहराइयों में उतरने की एक यात्रा है। लेकिन जब हम इस यात्रा की शुरुआत करते हैं तो अक्सर एक समस्या आती है मन भटकता है। हम कुछ क्षणों के लिए शांति का अनुभव करते हैं फिर अचानक विचारों की बाढ़ आने लगती है बीते अनुभव, भविष्य की योजनाएँ, इच्छाएँ, डर, अपेक्षाएँ। प्रश्न उठता है जब हम ध्यान में बैठते हैं तो मन क्यों भटकता है? क्या यह हमारी गलती है या मन का स्वाभाविक गुण? इस लेख में हम इस प्रश्न के हर पहलू को गहराई से समझेंगे वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से।

मन का स्वरूप- स्थिरता और अस्थिरता के बीच

1 मन की चंचलता एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है

मन स्वभाव से ही चंचल है। जैसे पानी का स्वभाव बहना है वैसे ही मन का स्वभाव विचार करना है। यह निरंतर किसी न किसी विषय में उलझा रहता है। कभी यह अतीत में घूमता है तो कभी भविष्य की कल्पनाओं में। वर्तमान क्षण में टिकना इसे कठिन लगता है। इसलिए जब हम ध्यान करते हैं और मन को एक बिंदु पर स्थिर करने का प्रयास करते हैं तो यह स्वाभाविक रूप से विरोध करता है।

2 मन का नियंत्रण आसान नहीं पर असंभव भी नहीं

भगवद् गीता में अर्जुन ने कहा था- मनः चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। अर्थात् मन अत्यंत चंचल, बलवान और कठिनता से नियंत्रित होने वाला है।

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ अर्थात अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित किया जा सकता है। यह उत्तर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

मन के भटकने के वैज्ञानिक कारण-

1 मस्तिष्क का Default Mode Network-

आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार जब हम किसी विशेष कार्य पर ध्यान केंद्रित नहीं करते तो मस्तिष्क का Default Mode Network सक्रिय हो जाता है। यह नेटवर्क हमें भटकाने में प्रमुख भूमिका निभाता है यानी यह हमें अतीत और भविष्य की सोच में उलझा देता है। ध्यान करते समय यही नेटवर्क सक्रिय हो जाता है जिससे मन इधर-उधर भागने लगता है।

2 अधिक विचारों की आदत-

हमारा दिमाग लगातार सोचने का आदी हो गया है। मोबाइल सोशल मीडिया, समाचार और कार्य का दबाव सबने मिलकर हमें विचार-निर्भर बना दिया है। जब हम ध्यान में बैठते हैं और सोच को रोकना चाहते हैं तो मन को यह अस्वाभाविक लगता है। इसलिए वह पुरानी आदत के अनुसार फिर से विचार उत्पन्न करता है।

3 अधूरी इच्छाएँ और दबी भावनाएँ-

कई बार ध्यान के दौरान जो विचार आते हैं वे हमारे अधूरे कार्यों, इच्छाओं और दबी हुई भावनाओं से जुड़े होते हैं। जब हम शांत बैठते हैं, तो ये भावनाएँ सतह पर आने लगती हैं। यही कारण है कि मन भटकने लगता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मन का विचलन-

1 अवचेतन मन की भूमिका-

हमारा मन केवल वही नहीं है जो हम सोचते हैं। इसके नीचे अवचेतन परतें हैं जहाँ हमारी यादें, भय, इच्छाएँ और संस्कार छिपे होते हैं। ध्यान के समय जब चेतन मन शांत होता है तो ये अवचेतन परतें सक्रिय हो जाती हैं जिससे मन भटकने लगता है।

2 असंतुलित जीवनशैली और तनाव-

यदि दिनभर हमारा मन तनाव, चिंता या असंतोष से भरा रहता है तो ध्यान में बैठने पर वही मानसिक ऊर्जा प्रतिबिंबित होती है। ध्यान कोई जादू नहीं जो तुरंत शांति दे दे। यह हमारी दिनचर्या, खान-पान और विचारों से जुड़ा हुआ अभ्यास है।

3 एकाग्रता की कमी और अधैर्य-

आज का मनुष्य परिणाम चाहता है- अभी और तुरंत।
लेकिन ध्यान एक प्रक्रिया है परिणाम नहीं। जब हमें तुरंत शांति या आनंद नहीं मिलता तो हम ऊब जाते हैं बेचैन होते हैं और मन बहाने बनाकर भटकने लगता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से मन का भटकना-

1 मन का शुद्धिकरण चल रहा होता है-

आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो जब मन भटकता है तो वास्तव में वह शुद्ध हो रहा होता है। ध्यान में बैठते ही हमारी अंदरूनी गहराइयों में छिपी अशांतियाँ ऊपर आने लगती हैं। यह एक शुद्धिकरण प्रक्रिया  है। जैसे गंदा पानी हिलाने पर गंदगी ऊपर आती है वैसे ही ध्यान के दौरान अवांछित विचार उभरते हैं।

2 अहंकार का प्रतिरोध-

ध्यान में जैसे-जैसे हम आत्मा के करीब आते हैं वैसे-वैसे अहंकार को खतरा महसूस होता है। वह खुद को बनाए रखने के लिए विचारों, कल्पनाओं और यादों की बाढ़ लाकर हमें भटकाता है।

3 मन को साक्षी बनाना ही उपाय है-

मन का विरोध नहीं, साक्षी भाव ही समाधान है। जब मन भटके तो बस देखें यह विचार भी आ रहा है जा रहा है। न तो उसे रोकें न पकड़ें। धीरे-धीरे मन को यह समझ आने लगता है कि उसका कोई दर्शक है और तब उसकी गति मंद पड़ जाती है।

मन को स्थिर करने के व्यावहारिक उपाय

1 नियमित अभ्यास-

ध्यान को रोजाना एक निश्चित समय पर करें सुबह या शाम।
नियमितता से मन धीरे-धीरे अनुकूल हो जाता है। पहले पाँच मिनट भी कठिन लग सकते हैं पर धीरे-धीरे यही पाँच मिनट पंद्रह और तीस बन जाते हैं।

2 श्वास पर ध्यान केंद्रित करें-

श्वास ही ध्यान की सबसे सरल चाबी है। बस अपने श्वास के आने-जाने को महसूस करें। जब मन भटके तो धीरे से उसे फिर से श्वास पर लाएँ। यह अभ्यास मन को वर्तमान में टिकाए रखता है।

3 डिजिटल डिटॉक्स करें-

सोने से पहले मोबाइल न देखें। दिनभर सोशल मीडिया की लत मन को अस्थिर बनाती है। ध्यान करने से पहले 15 मिनट का डिजिटल विराम लें।

4 ध्यान का सही आसन और वातावरण-

शांत जगह चुनें जहाँ कोई व्यवधान न हो। सामान्य तापमान हल्की रोशनी और खुली हवा ये तीन बातें ध्यान में स्थिरता लाती हैं।

5 मंत्र या ध्वनि का उपयोग-

कई लोगों के लिए मंत्र-जप ध्यान का श्रेष्ठ प्रारंभ होता है। जैसे ॐ सोऽहम् या राम  इनका कंपन मन की तरंगों को संतुलित करता है।

6 आत्मस्वीकार-

यदि ध्यान में मन भटके तो खुद पर दोष न लगाएँ। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। स्वीकार करें मन भटका है ठीक है। इस स्वीकृति से ही शांति जन्म लेती है।

ध्यान के दौरान मन को देखने की कला

ध्यान में उद्देश्य मन को रोकना नहीं बल्कि उसे देखना है। जब हम अपने विचारों को देखते हैं तो हम धीरे-धीरे उनसे अलग हो जाते हैं।
हम समझने लगते हैं कि मैं मन नहीं हूँ मैं उस मन का साक्षी हूँ। यही बोध ध्यान की चरम स्थिति है।

अनुभूति की यात्रा-

एक दिन ऐसा आता है जब ध्यान में बैठते ही मन स्वयं शांत हो जाता है। विचार आते हैं पर पकड़ नहीं पाते। उस क्षण हम महसूस करते हैं शांति बाहर नहीं मेरे भीतर थी। यही ध्यान का वास्तविक फल है आंतरिक मौन और आत्मिक स्वतंत्रता।

 निष्कर्ष-

मन का भटकना कोई विफलता नहीं बल्कि ध्यान का ही हिस्सा है।
जब भी मन भटके याद रखें यह अभ्यास की प्रक्रिया है। जैसे बच्चा चलना सीखते समय गिरता है, वैसे ही मन भी धीरे-धीरे स्थिर होता है।
ध्यान हमें सिखाता है स्वयं को देखने की कला और यही कला जीवन में सच्ची शांति आत्म-जागरूकता और मुक्ति की कुंजी बनती है। मन को रोकना नहीं उसे जानना ही ध्यान है। ध्यान का मार्ग कठिन नहीं केवल धैर्य माँगता है। हर बार जब मन भटके समझिए आप अपने भीतर की यात्रा पर हैं। भटकना भी ध्यान का हिस्सा है क्योंकि वही आपको यह सिखाता है कि मन कौन है और मैं कौन हूँ।