अहंकार का त्याग- आत्मिक स्वतंत्रता की सच्ची कुंजी

अहंकार का त्याग करते हुए व्यक्ति का चित्र

अहंकार का त्याग करते हुए व्यक्ति का चित्र
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
भूमिका-
मनुष्य की सबसे बड़ी जंजीर बाहरी नहीं बल्कि भीतरी होती है और उसका नाम है अहंकार। अहंकार वह अदृश्य दीवार है जो व्यक्ति को उसकी आत्मा से सच्चे सुख से और ईश्वर से अलग कर देती है। जब तक मनुष्य मैं और मेरा के दायरे में बंधा रहता है तब तक वह चाहे कितनी भी सफलता पा ले वह आत्मिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकता। अहंकार का त्याग केवल नैतिक शिक्षा नहीं बल्कि आत्मा की मुक्ति की प्रक्रिया है। यह वही मार्ग है जो व्यक्ति को अंदर से हल्का करता है और उसे प्रेम, करुणा तथा समर्पण की ओर ले जाता है।
अहंकार क्या है?
अहंकार की परिभाषा-
अहंकार का अर्थ है अपने अस्तित्व को शरीर, पद, धन, ज्ञान या शक्ति से जोड़ लेना। जब हम अपने सच्चे स्व की पहचान खोकर, बाहरी वस्तुओं या उपलब्धियों में अपनी पहचान ढूँढते हैं, तो वही अहंकार है। अहंकार वह पर्दा है जो आत्मा और परमात्मा के बीच आ जाता है।
अहंकार के प्रकार-
1 शारीरिक अहंकार- अपने सौंदर्य, बल या स्वास्थ्य पर घमंड।
2 बौद्धिक अहंकार- अपने ज्ञान या समझ को दूसरों से श्रेष्ठ समझना।
3 सामाजिक अहंकार- पद, जाति या धन के कारण अपने को बड़ा मानना।
4 धार्मिक अहंकार- अपनी साधना या भक्ति को दूसरों से श्रेष्ठ समझना।
5 आध्यात्मिक अहंकार- जब व्यक्ति आध्यात्मिकता में भी मैं को लाता है मैं साधक हूँ, मैं जानता हूँ। इन सभी अहंकारों की जड़ एक ही है मैं श्रेष्ठ हूँ का भाव।
अहंकार के परिणाम-
1 संबंधों में दूरी
अहंकारी व्यक्ति हमेशा तुलना करता है। वह दूसरों को नीचा दिखाने में सुख अनुभव करता है। इससे प्रेम, सहयोग और सामंजस्य समाप्त हो जाते हैं।
2 मन की अशांति
जहाँ अहंकार होता है वहाँ संतोष नहीं रहता। हर समय श्रेष्ठ दिखने की लालसा व्यक्ति को बेचैन रखती है।
3 आत्मज्ञान से दूरी
अहंकार व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कर देता है। जब तक मैं जानता हूँ का भाव है तब तक सत्य का दर्शन नहीं हो सकता। जो झुकता है वही देखता है जो ऊँचा खड़ा होता है उसके लिए आकाश भी सीमित हो जाता है।
अहंकार का त्याग क्यों आवश्यक है
अहंकार का त्याग आत्मा को मुक्त करता है। यह हमारे भीतर से भार को हटाता है, जिससे मन हल्का और शांत होता है।
1 आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव
जब व्यक्ति मैं और मेरा से ऊपर उठता है तब वह जीवन के हर अनुभव को सहजता से स्वीकार करता है। यह स्वीकृति ही सच्ची स्वतंत्रता है।
2 करुणा और प्रेम का उदय
अहंकार हटने पर दूसरा बचता ही नहीं। हर प्राणी में उसी आत्मा का प्रकाश दिखाई देने लगता है। तब मनुष्य करुणा, सहानुभूति और प्रेम से भर जाता है।
3 ईश्वर से एकात्मता
अहंकार समाप्त होते ही मैं मिट जाता है और केवल ‘वह’ रह जाता है। यह स्थिति ही आत्मा और परमात्मा का मिलन है।
अहंकार त्यागने के उपाय
1 आत्मनिरीक्षण
हर दिन स्वयं से पूछिए क्या मेरी बातों या कर्मों में मैं श्रेष्ठ का भाव तो नहीं आ गया? अंतर्दर्शन से व्यक्ति अपने अंदर के सूक्ष्म अहंकार को पहचान सकता है। पहचान ही परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।
2 नम्रता का अभ्यास
नम्रता कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति का रूप है। जब हम अपने ज्ञान, पद या योग्यता के बावजूद विनम्र बने रहते हैं तब अहंकार स्वतः गलने लगता है।
3 सेवा भावना
निर्लोभ सेवा अहंकार को भस्म करती है। जब हम दूसरों के लिए कुछ करते हैं बिना श्रेय की कामना के तब मैं की दीवार टूटती है।
4 कृतज्ञता का भाव
हर परिस्थिति में धन्यवाद देना सीखें। कृतज्ञता यह स्वीकार है कि कुछ भी केवल मेरे प्रयास से नहीं होता इसमें ईश्वर, प्रकृति और अनगिनत लोगों का सहयोग है।
5 मौन साधना
मौन में व्यक्ति स्वयं को सुनता है। यह भीतर की शांति से अहंकार के शोर को शांत करने का सबसे प्रभावी साधन है।
अहंकार और आत्म-सम्मान में अंतर
आध्यात्मिक दृष्टि से अहंकार का अंत
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है- अहंकार, बल, काम और क्रोध से मुक्त होकर जो भक्ति करता है वही मुझमें आता है। अर्थात भक्ति का मार्ग अहंकार-मुक्ति से होकर गुजरता है। जब तक मैं करता हूँ का भाव रहता है तब तक ईश्वर का अनुभव अधूरा है। सच्चा साधक वही है जो कह सके- मैं कुछ नहीं सब कुछ तू है।
जीवन में अहंकार-त्याग के उदाहरण
1 महात्मा गांधी- उनके पास अपार शक्ति थी फिर भी वे अत्यंत विनम्र रहे। उनका जीवन सिखाता है कि विनम्रता में ही सच्चा बल है।
2 बुद्ध- ज्ञान प्राप्ति के बाद भी बुद्ध ने कहा- मैं कोई विशेष नहीं मैं केवल जागा हुआ हूँ। यह वक्तव्य अहंकार-रहित ज्ञान का प्रतीक है।
3 तुलसीदास और मीरा- दोनों संतों ने प्रेम और समर्पण में अपने अहंकार को पूर्णतः भुला दिया। उनकी वाणी आज भी नम्रता और भक्ति की प्रेरणा देती है।
अहंकार त्याग से जीवन में आने वाले परिवर्तन
1 मन की शांति और सुकून बढ़ता है।
2 संबंधों में प्रेम और समरसता लौटती है।निर्णय लेने की स्पष्टता आती है।
3 सफलता में संतुलन और असफलता में धैर्य आता है।
4 आत्मा का प्रकाश अनुभव में आने लगता है।
अहंकार का सूक्ष्म रूप-
अहंकार का त्याग और आत्मिक स्वतंत्रता का अनुभव
जब अहंकार का पर्दा हटता है तब आत्मा का प्रकाश स्वयं प्रकट होता है। तब व्यक्ति बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता। उसके सुख-दुःख बाहरी परिस्थितियों पर नहीं बल्कि आंतरिक स्थिरता पर निर्भर होते हैं। यही है आत्मिक स्वतंत्रता- जहाँ न कोई भय है, न तुलना, न प्रतिस्पर्धा सिर्फ शांत, निर्मल चेतना का अनुभव।
आत्म-समर्पण ही अंतिम मुक्ति
अहंकार का त्याग कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं यह एक आजीवन साधना है। हर दिन, हर परिस्थिति में, मैं को थोड़ा-थोड़ा मिटाना ही आत्मिक विकास है। जहाँ मैं मिटता है वहीं परमात्मा प्रकट होता है। अहंकार का त्याग ही आत्मिक स्वतंत्रता की सच्ची कुंजी है।
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