स्वयं की गहराइयों में उतरने से पहले डर का सामना कैसे करें
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
मनुष्य के जीवन में दो तरह की यात्राएं होती हैं- एक बाहरी जो दुनिया के रास्तों पर होती है और दूसरी आंतरिक जो हमारे मन, आत्मा और चेतना के रास्तों से होकर गुजरती है।
बाहरी यात्रा में हम नए शहर, पहाड़, समुद्र और संस्कृतियां देखते हैं। लेकिन आंतरिक यात्रा में हम अपने भीतर की परतों को खोलते हैं-अपने विचार, भावनाएं, डर, इच्छाएं और वे सच जिनसे हम लंबे समय से भागते आ रहे हैं।
इस गहरी यात्रा का पहला पड़ाव अक्सर डर होता है। यह डर अदृश्य दीवार की तरह हमारे सामने खड़ा हो जाता है मानो कह रहा हो-
अगर आगे बढ़ना है तो पहले मेरा सामना करो।
1 डर को समझना- यह क्या है और क्यों आता है?
डर हमारे मन का एक प्राकृतिक हिस्सा है। यह हमें खतरों से बचाने के लिए बना है लेकिन जब यह बिना वजह सक्रिय हो जाता है तो यह हमें आंतरिक विकास से रोक देता है।
डर के मुख्य कारण-
1 अज्ञात का भय- भीतर क्या मिलेगा यह न जानने का डर।
2 सत्य का भय- खुद के बारे में असुविधाजनक सच सामने आने का डर।
3 निर्णय का भय- दूसरों के विचार और आलोचना का डर।
4 परिवर्तन का भय- अपनी पुरानी पहचान खोने का डर।
उदाहरण-
रीना ध्यान का अभ्यास शुरू करना चाहती थी। जैसे ही वह आंखें बंद करती पुराने दर्दनाक अनुभव उसकी आंखों के सामने आने लगते। उसे डर था कि अगर उसने इन यादों का सामना किया तो वह टूट जाएगी। लेकिन वास्तव में ये यादें सिर्फ इसलिए उभर रही थीं क्योंकि वे ठीक होना चाहती थीं।
2 डर को दुश्मन नहीं शिक्षक मानना-
डर को हराने की कोशिश में हम अक्सर थक जाते हैं, क्योंकि हम उससे लड़ रहे होते हैं। लेकिन अगर हम डर को एक मार्गदर्शक मान लें, तो यह हमें बताता है कि हमारी अगली वृद्धि कहां हो सकती है।
जहां डर है वहीं आपकी सबसे बड़ी संभावना छिपी है।
सोच बदलने का अभ्यास-
- डर आने पर खुद से पूछें:
- यह मुझे किस चीज़ से बचा रहा है?
- क्या यह डर वास्तविक खतरा है या सिर्फ मेरी कल्पना?
- अगर मैं इसे पार कर लूं तो मुझे क्या मिलेगा?
3 डर का अवलोकन करना- Mindfulness की ताकत
डर का सबसे बड़ा हथियार है- हमारा ध्यान चुरा लेना। जब हम इसे बस देखना शुरू करते हैं तो इसकी पकड़ ढीली पड़ जाती है।
अवलोकन का अभ्यास-
- एक शांत जगह बैठें।
- आंखें बंद करें और अपने डर को महसूस करें।
- उसे मन में एक आकार रंग और रूप दें।
- बिना जजमेंट किए देखें मानो आप किसी फिल्म का दृश्य देख रहे हों।
धीरे-धीरे आपको लगेगा कि डर सिर्फ एक संवेदना है कोई राक्षस नहीं।
4. डर की जड़ तक पहुंचना-
हर डर के पीछे एक कहानी होती है- यह बचपन की घटनाओं पुराने अनुभवों या दूसरों के कहे शब्दों से बनी होती है।
केस स्टडी-
राहुल को लोगों के सामने बोलने का डर था। जब उसने गहराई से सोचा तो पता चला कि बचपन में एक बार क्लास में जवाब गलत देने पर पूरी क्लास ने हंस दिया था। उस दिन से उसने तय कर लिया कि वह भीड़ में नहीं बोलेगा।
इस कहानी को पहचानने के बाद राहुल ने धीरे-धीरे इस डर को तोड़ दिया।
5 डर को शब्दों में ढालना-
जब हम अपने डर को कागज़ पर लिखते हैं तो वह हमारे दिमाग में घूमना बंद कर देता है।
Writing Exercise:
- रोज़ 15 मिनट अपने डर के बारे में लिखें।
- यह मत सोचें कि कोई पढ़ेगा या नहीं।
- महीने के अंत में इसे पढ़ें और देखें कि आपका डर कितना बदल गया है।
6 छोटे कदम- धीरे-धीरे गहराई में उतरना
अचानक गहरे पानी में कूदना खतरनाक है। बेहतर है कि पहले सतह पर तैरना सीखें।
1 स्टेप-बाय-स्टेप तरीका-
2 पहले हल्के भावनात्मक मुद्दों पर ध्यान दें।
3 फिर धीरे-धीरे कठिन अनुभवों पर जाएं।
4 समय-समय पर ब्रेक लें ताकि आप मानसिक रूप से थकें नहीं।
7 शरीर और सांस की मदद लेना
डर आने पर शरीर में बदलाव आते हैं दिल की धड़कन तेज मांसपेशियों में खिंचाव और सांस उथली हो जाती है।
सांस का अभ्यास-
- 4 सेकंड में गहरी सांस लें।
- 4 सेकंड रोकें।
- 4 सेकंड में धीरे-धीरे छोड़ें।
यह तुरंत मन और शरीर को शांत कर देता है।
8 सपोर्ट सिस्टम बनाना-
भीतर की यात्रा अकेले की जा सकती है लेकिन अगर साथ में एक सहारा हो तो यह आसान हो जाती है।
सहारे के स्रोत:
- भरोसेमंद दोस्त
- ध्यान/योग समूह
- आध्यात्मिक गुरु
- मनोवैज्ञानिक सलाहकार
9 आत्म-दया का अभ्यास-
जब हम डर का सामना करते हैं, तो अपने साथ कोमल रहना जरूरी है।
- खुद से कहें- मैं सुरक्षित हूं और यह सामान्य है।
- अपनी असफलताओं को भी सीखने के मौके की तरह देखें।
10 डर के पार: वास्तविक गहराई की शुरुआत-
जब हम डर का सामना कर लेते हैं, तो हम अपनी असली यात्रा शुरू करते हैं जहां आत्म-बोध, शांति और आंतरिक शक्ति मिलती है।
डर के उस पार वही जीवन है जिसका आपने हमेशा सपना देखा है।
निष्कर्ष-
स्वयं की गहराइयों में उतरना साहस मांगता है और डर इस साहस की पहली परीक्षा है। अगर हम डर को समझें उसे देखेंनउसकी जड़ तक जाएं और छोटे-छोटे कदमों में उसका सामना करें तो यह यात्रा न सिर्फ संभव बल्कि आनंददायक हो जाती है।
डर आपको रोकने के लिए नहीं बल्कि तैयार करने के लिए आता है।
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