अपनी भावनाओं को पहचानने की कला
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अपनी भावनाओं को पहचानने के लिए अभ्यास |
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
नीचे इस कला को विस्तार से समझते हैं।
1 भावनाएँ क्या हैं?
भावनाएँ हमारे विचारों, अनुभवों, यादों और अपेक्षाओं का मिश्रण होती हैं। वे हमारे शरीर पर भी असर डालती हैं।
- डर हो तो दिल तेज़ धड़कता है
- खुशी हो तो चेहरा खिल उठता है
- गुस्सा आए तो शरीर में गर्मी बढ़ती है
- घबराहट बढ़े तो हाथ-पाँव ठंडे पड़ जाते हैं
भावनाएँ आती-जाती रहती हैं पर उनका असली पहचान तब होती है जब हम उन्हें देख और समझ सकें।
2 भावनाओं की पहचान क्यों जरूरी है?
भावनाओं की पहचान हमें यह फायदे देती है-
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बेहतर निर्णय लेने की क्षमताजब आप जानते हैं कि आप गुस्से में हैं तब आप impulsive निर्णय से बच जाते हैं।जब आप जानते हैं कि आप डर के कारण पीछे हट रहे हैं तो आप नए कदम उठाने का साहस जुटा लेते हैं।
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रिश्तों में समझ बढ़ती हैअपनी भावनाएँ पहचानने वाला व्यक्ति दूसरों की भावनाएँ भी बेहतर समझ पाता है।
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मानसिक शांति बढ़ती हैभीतर क्या चल रहा है यह पता हो तो मन का दबाव कम होता है।
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आत्म-जागरूकता में वृद्धिआप खुद को बेहतर जानने लगते हैं।कौन-सी परिस्थिति आपको परेशान करती है कौन-सी प्रेरित करती है यह सब स्पष्ट होता है।
3 भावनाओं को न पहचान पाने के कारण
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पारिवारिक-सामाजिक माहौललड़के रोते नहीं।इतनी सी बात पर दुखी हो गई?ऐसे वाक्य लोगों को अपनी भावनाओं को छुपाना सिखाते हैं।
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भावनाओं का शब्दकोश न होनाबहुत से लोग सिर्फ तीन ही भावनाएँ पहचानते हैं-गुस्सा, खुशी, उदासी।जबकि भावनाएँ सैकड़ों तरह की होती हैं।
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व्यस्त जीवनशैलीहम इतने कामों में उलझ जाते हैं कि खुद की तरफ देखने का समय ही नहीं मिलता।
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टालमटोल और भावनाओं से भागनाकुछ भावनाएँ कड़वी लगती हैं।इसलिए लोग उनसे बचते हैं जबकि पहचानना जरूरी होता है।
4 भावनाओं को पहचानने के लिए पहला कदम-
5 शरीर संकेत देता है-
- चिंता- छाती में दबाव, पेट में हलचल।
- गुस्सा- जबड़े का कसना, शरीर में गर्मी।
- उदासी- थकान, कंधों का भारी लगना।
- उत्साह- ऊर्जा का बढ़ना।
6 भावनाओं का नामकरण-
भावनाओं पर सबसे बड़ा नियंत्रण तब मिलता है जब हम उन्हें नाम दे पाते हैं।
उदाहरण-
- मैं सिर्फ परेशान नहीं हूँ मैं चिंतित हूँ।
- मैं गुस्सा नहीं हूँ मैं खुद को अनसुना महसूस कर रहा हूँ।
- मैं दुखी नहीं हूँ मुझे हानि का एहसास है।
भावना का नाम लेना यानी उसे पहचानना। और पहचानी गई भावना संभाली जा सकती है
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7 अपनी भावनाओं की डायरी बनाएं
दिन के अंत में 5 मिनट निकालकर लिखें-
- आज मैंने क्या महसूस किया?
- क्यों महसूस किया?
- शरीर ने क्या संकेत दिए?
- इस भावना ने मुझसे क्या करवाया?
8 भावनाओं के पीछे की कहानी खोजें
- गुस्सा कई बार किसी पुरानी चोट का बचा हुआ दर्द होता है।
- जलन कई बार आत्मविश्वास की कमी की आवाज होती है।
- चिंता कई बार भविष्य की अनिश्चितता की छाया होती है।
9 भावनाओं को स्वीकार करना ही असली ताकत है
10 भावनाएँ साझा करें-
लेकिन साझा करते समय भावना बोलें दोष नहीं।
- खुद से बात करें।
- सवाल पूछें।
- दिन का अनुभव खुद को सुनाएँ।
मन को आवाज देने से भावनाएँ साफ होने लगती हैं।
- सतह- गुस्सा
- गहराई- डर या चोट
- शांत बैठें
- गहरी साँस लें
- भावना को स्वीकारें
- उसे नाम दें
- उसका कारण लिखें
- भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें
धीरे-धीरे वे साफ होने लगेंगी।
15 भावनाओं को पहचानने की कला में महारत कैसे पाएं?
- रोज 5 मिनट चुप बैठें
- अपने शरीर के संकेत देखें
- भावनाओं का नामकरण करें
- डायरी लिखें
- कारण खोजें
- भावना स्वीकारें
- साझा करें
- नियमित अभ्यास करें
धीरे-धीरे भावनाएँ साफ अक्षरों में दिखाई देने लगेंगी।
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