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अपनी भावनाओं को पहचानने की कला

अपनी भावनाओं को पहचानने के लिए अभ्यास

अपनी भावनाओं को पहचानने के लिए अभ्यास

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

भूमिका
कभी-कभी हम अपने मन को एक ऐसे कमरे जैसा पा लेते हैं जहाँ खिड़कियाँ तो बहुत हैं पर रोशनी कहीं अटकी सी है। बाहर से कोई पूछ ले कि कैसे हो? तो हम मुस्करा कर कह देते हैं मैं ठीक हूँ जबकि भीतर किसी अनसुने कोने में उदासी आखिरी पन्ना पलट रही होती है। यह दूरी जो हमारी वास्तविक भावनाओं और हमारी बोलियों के बीच बन जाती है वही हमें भीतर से उलझाती रहती है।
भावनाओं को पहचान पाना कोई जन्मजात गुण नहीं। यह सीखने की कला है। यह वह शांत अभ्यास है जिसमें हम अपने मन की लहरों को सिर्फ देखते हैं उन्हें धक्का नहीं देते। यह वह कौशल है जो जीवन के हर मोड़ पर हमें सहारा देता है।

नीचे इस कला को विस्तार से समझते हैं।

1 भावनाएँ क्या हैं? 

भावनाएँ दरअसल हमारे भीतर की प्रतिक्रियाएँ हैं। जैसे मौसम बदलता है वैसे ही भावनाएँ भी अपने रंग बदलती हैं।
कभी वे हल्की फुहार बनकर आती हैं कभी तूफान।
कभी अचानक से उठती हैं कभी धीरे-धीरे बढ़कर एक भारी बादल बन जाती हैं।

भावनाएँ हमारे विचारों, अनुभवों, यादों और अपेक्षाओं का मिश्रण होती हैं। वे हमारे शरीर पर भी असर डालती हैं।

  • डर हो तो दिल तेज़ धड़कता है
  • खुशी हो तो चेहरा खिल उठता है
  • गुस्सा आए तो शरीर में गर्मी बढ़ती है
  • घबराहट बढ़े तो हाथ-पाँव ठंडे पड़ जाते हैं

भावनाएँ आती-जाती रहती हैं पर उनका असली पहचान तब होती है जब हम उन्हें देख और समझ सकें।

2 भावनाओं की पहचान क्यों जरूरी है?

भावनाओं को न पहचान पाने से जीवन में कई समस्याएँ पनपती हैं।
हम कभी गलत निर्णय ले लेते हैं।
कभी रिश्ते को नुकसान पहुँचा देते हैं।
कभी खुद से ही दूर हो जाते हैं।

भावनाओं की पहचान हमें यह फायदे देती है-

  1. बेहतर निर्णय लेने की क्षमता
    जब आप जानते हैं कि आप गुस्से में हैं तब आप impulsive निर्णय से बच जाते हैं।
    जब आप जानते हैं कि आप डर के कारण पीछे हट रहे हैं तो आप नए कदम उठाने का साहस जुटा लेते हैं।

  2. रिश्तों में समझ बढ़ती है
    अपनी भावनाएँ पहचानने वाला व्यक्ति दूसरों की भावनाएँ भी बेहतर समझ पाता है।

  3. मानसिक शांति बढ़ती है
    भीतर क्या चल रहा है यह पता हो तो मन का दबाव कम होता है।

  4. आत्म-जागरूकता में वृद्धि
    आप खुद को बेहतर जानने लगते हैं।
    कौन-सी परिस्थिति आपको परेशान करती है कौन-सी प्रेरित करती है यह सब स्पष्ट होता है।

3 भावनाओं को न पहचान पाने के कारण

मन अक्सर उस गुप्त डिब्बे जैसा होता है जिसमें हमने सालों से भावनाएँ दबा कर रख दी हों।
कई कारण होते हैं-

  1. पारिवारिक-सामाजिक माहौल
    लड़के रोते नहीं।
    इतनी सी बात पर दुखी हो गई?
    ऐसे वाक्य लोगों को अपनी भावनाओं को छुपाना सिखाते हैं।

  2. भावनाओं का शब्दकोश न होना
    बहुत से लोग सिर्फ तीन ही भावनाएँ पहचानते हैं-
    गुस्सा, खुशी, उदासी।
    जबकि भावनाएँ सैकड़ों तरह की होती हैं।

  3. व्यस्त जीवनशैली
    हम इतने कामों में उलझ जाते हैं कि खुद की तरफ देखने का समय ही नहीं मिलता।

  4. टालमटोल और भावनाओं से भागना
    कुछ भावनाएँ कड़वी लगती हैं।
    इसलिए लोग उनसे बचते हैं जबकि पहचानना जरूरी होता है।

4 भावनाओं को पहचानने के लिए पहला कदम-

भावनाएँ किसी पेड़ की पत्तियों की तरह हिलती रहती हैं।
उन्हें देखने के लिए हमें रुकना पड़ता है।

आप दिन में एक-दो मिनट भी ठहरें।
आँखें बंद करें।
गहरी साँस लें।
और मन में झाँकें।
यह साधारण सा कदम अंदर के धुंधलेपन को साफ करने लगता है।

5 शरीर संकेत देता है-

भावनाएँ शरीर के माध्यम से दुनिया को अपना पता बताती हैं।
कुछ उदाहरण-

  • चिंता- छाती में दबाव, पेट में हलचल।
  • गुस्सा- जबड़े का कसना, शरीर में गर्मी।
  • उदासी- थकान, कंधों का भारी लगना।
  • उत्साह- ऊर्जा का बढ़ना।

जब भी शरीर में कुछ अलग महसूस हो यह पूछें-
मेरे शरीर को यह बदलाव किस भावना की वजह से महसूस हो रहे हैं?

6 भावनाओं का नामकरण-

भावनाओं पर सबसे बड़ा नियंत्रण तब मिलता है जब हम उन्हें नाम दे पाते हैं।

उदाहरण-

  • मैं सिर्फ परेशान नहीं हूँ मैं चिंतित हूँ।
  • मैं गुस्सा नहीं हूँ मैं खुद को अनसुना महसूस कर रहा हूँ।
  • मैं दुखी नहीं हूँ मुझे हानि का एहसास है।

भावना का नाम लेना यानी उसे पहचानना। और पहचानी गई भावना संभाली जा सकती है 

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7 अपनी भावनाओं की डायरी बनाएं

दिन के अंत में 5 मिनट निकालकर लिखें-

  • आज मैंने क्या महसूस किया?
  • क्यों महसूस किया?
  • शरीर ने क्या संकेत दिए?
  • इस भावना ने मुझसे क्या करवाया?

यह अभ्यास मन को साफ करने की तरह काम करता है।
धीरे-धीरे पैटर्न समझ आने लगता है।

8 भावनाओं के पीछे की कहानी खोजें

हर भावना एक कहानी लेकर आती है।
जैसे:

  • गुस्सा कई बार किसी पुरानी चोट का बचा हुआ दर्द होता है।
  • जलन कई बार आत्मविश्वास की कमी की आवाज होती है।
  • चिंता कई बार भविष्य की अनिश्चितता की छाया होती है।

भावना देखें और पूछें-
इस भावना के पीछे छिपी बात क्या है?

9 भावनाओं को स्वीकार करना ही असली ताकत है

ज्यादातर लोग भावनाओं से लड़ते हैं। लेकिन लड़ाई से भावनाएँ और मजबूत हो जाती हैं।
उन्हें स्वीकार करना ही असली शांति देता है।

स्वीकार करने का मतलब यह नहीं कि भावना सही है।
इसका मतलब यह है कि आप उसे मान रहे हैं समझ रहे हैं।

जैसे किसी कमरे में अंधेरा हो तो रोशनी जलाने से पहले हम स्वीकार करते हैं कि अंधेरा है।
ठीक वैसे ही भावनाएँ भी स्वीकारने पर साफ दिखने लगती हैं।

10 भावनाएँ साझा करें-

जब हम अपनी भावनाएँ किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करते हैं
तो मन हल्का हो जाता है और भावनाएँ सरल लगने लगती हैं।

लेकिन साझा करते समय भावना बोलें दोष नहीं।

उदाहरण-
गलत- तुम हमेशा मुझे गुस्सा दिलाते हो।
सही- तुम्हारी बात से मुझे दुख महसूस हुआ।

11 भावनाओं को समझने के लिए दर्पण तकनीक

दर्पण से ही चेहरा साफ दिखता है।
इसी तरह अपनी भावनाएँ समझने के लिए आप यह तकनीक अपनाएँ-

  • खुद से बात करें।
  • सवाल पूछें।
  • दिन का अनुभव खुद को सुनाएँ।

मन को आवाज देने से भावनाएँ साफ होने लगती हैं।

12 भावनाओं का विस्तार-

कभी-कभी जो भावना दिखती है वह असली नहीं होती।
उदाहरण-

  • सतह- गुस्सा
  • गहराई- डर या चोट

इसलिए मन से पूछें-
मेरी असली भावना कौन सी है?

13 कठिन भावनाओं की पहचान कैसे करें

कुछ भावनाएँ भारी होती हैं जैसे अपराधबोध, शर्म, अकेलापन।
इन भावनाओं को पहचानने के लिए-

  1. शांत बैठें
  2. गहरी साँस लें
  3. भावना को स्वीकारें
  4. उसे नाम दें
  5. उसका कारण लिखें
  6. भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें

धीरे-धीरे वे साफ होने लगेंगी।

14 आत्म- सहानुभूति का अभ्यास

अपने प्रति दयालु रहें।
भावनाएँ गलत नहीं होतीं, वे सिर्फ संकेत होती हैं।

हर भावना कह रही होती है-
मुझे देखो मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूँ।

15 भावनाओं को पहचानने की कला में महारत कैसे पाएं?

  1. रोज 5 मिनट चुप बैठें
  2. अपने शरीर के संकेत देखें
  3. भावनाओं का नामकरण करें
  4. डायरी लिखें
  5. कारण खोजें
  6. भावना स्वीकारें
  7. साझा करें
  8. नियमित अभ्यास करें

धीरे-धीरे भावनाएँ साफ अक्षरों में दिखाई देने लगेंगी।

16 निष्कर्ष-

भावनाओं को पहचानना जीवन को समझने जैसा है।
जब हम अपनी भावनाओं को देखते हैं।
तो उनका शोर कम हो जाता है।
वे हमें परेशान नहीं करतीं
सहारा देती हैं।

भावनाएँ दुश्मन नहीं।
वे मन का नक्शा हैं।
उन्हें समझ लें तो जीवन की राहें साफ दिखने लगती हैं।

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