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मनोवृत्तियों की पहचान- आत्म-बोध और व्यक्तित्व विकास की दिशा

साधना करते हुए

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1 प्रस्तावना-

मनुष्य के भीतर एक अदृश्य संसार होता है- विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं का संसार, जिसे हम मनोवृत्ति कहते हैं। यह वही तत्व है जो किसी व्यक्ति के व्यवहार, दृष्टिकोण और निर्णयों को प्रभावित करता है।
मनोवृत्तियाँ न तो स्थायी होती हैं और न ही एक जैसी वे समय, परिस्थिति, अनुभव और ज्ञान के अनुसार बदलती रहती हैं।
मनोवृत्तियों की पहचान का अर्थ है- अपने भीतर झाँकना, अपने विचारों के स्रोत को समझना, और यह जानना कि मैं ऐसा क्यों सोचता या करता हूँ।

2 मनोवृत्ति की परिभाषा और प्रकृति

‘मनोवृत्ति’ शब्द दो शब्दों से बना है- मन + वृत्ति, अर्थात् मन की प्रवृत्ति या झुकाव
यह किसी व्यक्ति के सोचने, समझने, प्रतिक्रिया देने और निर्णय लेने के ढंग को निर्धारित करती है।
उदाहरण के लिए-

  • कोई व्यक्ति हर परिस्थिति में आशावादी दृष्टिकोण रखता है, तो उसकी मनोवृत्ति सकारात्मक है।
  • वही व्यक्ति यदि हर स्थिति में नकारात्मकता ढूँढता है तो उसकी मनोवृत्ति नकारात्मक कही जाएगी।

मनोवृत्ति की प्रकृति तीन स्तरों पर कार्य करती है-

  1. बौद्धिक स्तर पर- विचार और तर्क की दिशा निर्धारित करती है।
  2. भावनात्मक स्तर पर- संवेदनाओं और सहानुभूति की गुणवत्ता तय करती है।
  3. व्यवहारिक स्तर पर- कर्म और आचरण में संतुलन लाती है।

3 मनोवृत्तियों का निर्माण कैसे होता है-

मनोवृत्तियाँ जन्मजात नहीं होतीं वे समय के साथ संस्कारों अनुभवों और परिवेश से निर्मित होती हैं।
इनके निर्माण में कई कारक योगदान देते हैं-

(क) परिवार और बाल्यकालीन अनुभव-

माता-पिता, घर का वातावरण और बचपन के अनुभव व्यक्ति की सोच को गहराई से प्रभावित करते हैं। यदि परिवार में स्नेह, अनुशासन और सहयोग का माहौल हो, तो व्यक्ति की मनोवृत्ति भी संतुलित और दयालु होती है।

(ख) शिक्षा और समाज-

शिक्षा केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि दृष्टिकोण भी देती है। एक अच्छा शिक्षण वातावरण व्यक्ति में सहिष्णुता, विवेक और आत्म-सम्मान का विकास करता है।

(ग) संस्कार और परंपराएँ-

भारतीय संस्कृति में कहा गया है - संस्कार ही मनुष्य का वास्तविक गहना हैं।
संस्कारों से व्यक्ति की वृत्तियाँ नियंत्रित होती हैं वे सही-गलत का निर्णय करने में सहायक होती हैं।

(घ) अनुभव और आत्मचिंतन-

हर अनुभव मनोवृत्ति में नया अध्याय जोड़ता है।
जो व्यक्ति अंतर्दृष्टि से सीखता है उसकी मनोवृत्तियाँ अधिक परिपक्व होती हैं।

4 मनोवृत्तियों के प्रकार

मनोवृत्तियाँ व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार भिन्न होती हैं। इन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है:

(1) सकारात्मक मनोवृत्ति

यह मनोवृत्ति आशा, विश्वास और संतुलन की प्रतीक है।
ऐसे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अवसर खोजते हैं।
उदाहरण: महात्मा गांधी, अब्दुल कलाम, मदर टेरेसा।

(2) नकारात्मक मनोवृत्ति-

यह भय असुरक्षा, ईर्ष्या या निराशा से उपजती है।
ऐसे व्यक्ति दूसरों की सफलता में दुखी और अपनी असफलता में टूट जाते हैं।

(3) तटस्थ मनोवृत्ति-

यह वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति हर परिस्थिति में अत्यधिक प्रतिक्रिया नहीं देता। वह वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से सोचता है।

(4) रचनात्मक मनोवृत्ति-

ऐसी मनोवृत्तियाँ समाज और जीवन में नये विचारों, सुधारों और आविष्कारों का मार्ग खोलती हैं।

5 मनोवृत्तियों की पहचान क्यों आवश्यक है-

मनोवृत्तियों की पहचान केवल आत्मज्ञान का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह जीवन-संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य की आधारशिला है।
इसकी आवश्यकता निम्न कारणों से होती है-

  1. स्वयं को समझने के लिए-
    जब हम अपनी मनोवृत्तियों को पहचानते हैं, तो अपनी वास्तविक प्रेरणाओं और भय को जान पाते हैं।

  2. व्यक्तित्व विकास के लिए-
    सकारात्मक मनोवृत्तियाँ व्यक्तित्व को आकर्षक और प्रभावशाली बनाती हैं।

  3. संबंधों के सुधार हेतु:
    जब हम दूसरों की मनोवृत्तियों को समझते हैं तो मतभेदों में सहानुभूति और संवाद का पुल बनता है।

  4. मानसिक शांति के लिए:
    जो व्यक्ति अपनी नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचान लेता है वह धीरे-धीरे उन्हें नियंत्रित कर लेता है।

6 मनोवृत्तियों की पहचान के उपाय-

मनोवृत्तियों को पहचानना कोई कठिन योग नहीं, बल्कि सजगता और अंतर्दर्शन का अभ्यास है।
यहाँ कुछ प्रभावी उपाय दिए गए हैं-

(1) स्व-पर्यवेक्षण-

दिनभर के अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को नोट करें।
आप किस स्थिति में क्रोधित हुए, कब प्रसन्न रहे- यह पहचानने से आपके भीतर की मनोवृत्ति का मानचित्र बनने लगता है।

(2) ध्यान और आत्मचिंतन-

प्रत्येक दिन कुछ समय मौन में बिताएँ।
ध्यान के माध्यम से विचारों की परतें खुलती हैं और मनोवृत्ति की जड़ तक पहुँचना संभव होता है।

(3) डायरी लेखन-

दिन के अंत में अपनी भावनाओं को लिखना आत्म-निरीक्षण का सरल माध्यम है।
यह अभ्यास धीरे-धीरे नकारात्मक मनोवृत्तियों को उजागर करता है।

(4) सकारात्मक संगति-

जिनके साथ आप रहते हैं उनकी सोच का प्रभाव सीधा आपकी मनोवृत्ति पर पड़ता है।
इसलिए सकारात्मक और प्रेरक लोगों का संग रखें।

(5) आत्म-संवाद-

अपने आप से प्रश्न पूछें-

मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ?
क्या यह प्रतिक्रिया सही है?
क्या मेरा निर्णय विवेकपूर्ण है?

यह संवाद धीरे-धीरे मन की गहराइयों तक पहुँचाता है।

7 मनोवृत्तियों का मूल्यांकन

मनोवृत्तियों का मूल्यांकन तीन आधारों पर किया जा सकता है-

  1. भावनात्मक प्रतिक्रिया- क्या मैं हर स्थिति में स्थिर रह पाता हूँ?
  2. विचारों की दिशा- मेरे विचार अधिक सकारात्मक हैं या नकारात्मक?
  3. व्यवहार का स्वरूप- क्या मेरे कार्य दूसरों के हित में हैं या केवल स्वयं तक सीमित?

इन प्रश्नों के उत्तर व्यक्ति को अपनी वास्तविक मनोवृत्ति की झलक देते हैं।

8 नकारात्मक मनोवृत्तियों से मुक्ति के उपाय

यदि पहचान के बाद यह महसूस हो कि आपकी मनोवृत्तियाँ नकारात्मक दिशा में जा रही हैं तो घबराने की आवश्यकता नहीं।
मनोवृत्तियाँ परिवर्तनशील होती हैं।
यहाँ कुछ उपाय हैं जो संतुलन ला सकते हैं-

  1. कृतज्ञता का अभ्यास करें-
    हर दिन तीन ऐसी चीजें लिखें जिनके लिए आप आभारी हैं।

  2. क्षमा भाव विकसित करें-
    दूसरों की गलती को पकड़ने के बजाय उन्हें क्षमा करना आंतरिक शांति लाता है।

  3. सेवा और दान का अभ्यास-
    निःस्वार्थ सेवा से अहंकार गलता है और मनोवृत्ति निर्मल होती है।

  4. संतुलित जीवनशैली-
    सही आहार, नींद, और व्यायाम से मानसिक ऊर्जा स्थिर रहती है।

9 समाज और शिक्षा में मनोवृत्ति की भूमिका-

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि मनोवृत्तियों को परिष्कृत करना है।
यदि विद्यार्थी में सहिष्णुता, संयम और करुणा की भावना विकसित हो जाए, तो समाज में स्वाभाविक रूप से नैतिकता और सद्भाव बढ़ेगा।
शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यदि बच्चों में सकारात्मक मनोवृत्ति का निर्माण करें तो यह मानवता के उत्थान का सबसे मजबूत आधार बन सकता है।

10 निष्कर्ष-

मनोवृत्तियों की पहचान आत्म-विकास की पहली सीढ़ी है।
जब व्यक्ति स्वयं को जानने लगता है तो उसके भीतर के अंधकार में प्रकाश फैलने लगता है।
यह पहचान व्यक्ति को न केवल बेहतर बनाती है बल्कि उसके सम्पूर्ण जीवन को उद्देश्यपूर्ण बना देती है।

जिसने अपनी मनोवृत्तियों को जीत लिया उसने जीवन को जीत लिया।

मनोवृत्ति ही चरित्र है चरित्र ही नियति।
इसलिए अपनी मनोवृत्तियों को समझना उन्हें सकारात्मक दिशा देना एक जागरूक संतुलित और सुखी जीवन का रहस्य है।