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इच्छा वासना और उनकी प्रकृति
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
भूमिका
मानव जीवन की समग्र गति का मूल कारण इच्छा है। यह वही शक्ति है जो मनुष्य को चलाती है, प्रेरित करती है और कभी-कभी उसे भ्रम और पीड़ा के गर्त में भी ले जाती है। इच्छा के अनेक रूप हैं- आकांक्षा, लालसा, तृष्णा, मोह, वासना आदि। जब इच्छा का स्वरूप शुद्ध होता है तो वह सृजन, विकास और ज्ञान का कारण बनता है; परंतु जब वह वासना के रूप में विकृत होती है तो पतन दुख और बंधन का स्रोत बन जाती है।
इसी द्वैत के बीच मानव चेतना सदैव झूलती रही है- एक ओर शुद्ध इच्छा का मार्ग जो आत्मोन्नति की ओर ले जाता है, और दूसरी ओर वासना का मार्ग जो आत्मविस्मृति की ओर धकेलता है।
1 इच्छा की उत्पत्ति और मनोवैज्ञानिक आधार
इच्छा का उद्गम मानव मन में अभाव की अनुभूति से होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु, सुख या स्थिति की कमी का अनुभव होता है तब उसके भीतर उसे पाने की इच्छा जन्म लेती है।
संस्कृत में इसे कामना कहा गया है। उपनिषदों में कहा गया है-
काम एव मनुष्यं प्रथमो जायते सबसे पहले मनुष्य में काम यानी इच्छा का उदय होता है फिर कर्म होता है और अंततः परिणाम मिलता है।
मनोविज्ञान के अनुसार इच्छा एक मानसिक ऊर्जा है जो व्यक्ति के लक्ष्य निर्धारण और क्रियाशीलता का मूल प्रेरक तत्व है। बिना इच्छा के कोई भी जीव सक्रिय नहीं रह सकता। इच्छा ही लक्ष्य को जन्म देती है और उसी के अनुरूप व्यक्ति कार्य करता है।
2 इच्छा और वासना में अंतर
अक्सर लोग इच्छा और वासना को एक समान समझ लेते हैं जबकि इन दोनों के बीच एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत गहरा अंतर है। उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी की इच्छा होती है कि वह ज्ञान प्राप्त करे यह एक शुद्ध रचनात्मक इच्छा है। परंतु यदि वही व्यक्ति दूसरों से अधिक अंक पाने की वासना में ईर्ष्या और छल करने लगे तो वह इच्छा वासना में बदल जाती है।
3 वासना की उत्पत्ति और उसका स्वरूप
वासना शब्द का अर्थ है- तीव्र और विवेकहीन तृष्णा। यह केवल शारीरिक नहीं मानसिक और भौतिक स्तर पर भी प्रकट होती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वासना मन की उस प्रवृत्ति का परिणाम है जो अधिकाधिक सुख प्राप्त करने की लालसा से उत्पन्न होती है।
वासना का स्वरूप असंतोष से जुड़ा है- व्यक्ति जितना पाता है उतना ही और पाने की चाह करता है। यही अनंत दौड़ उसे भीतर से रिक्त और अशांत बना देती है।
धर्मग्रंथों में वासना को मानव पतन का प्रमुख कारण बताया गया है। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
अर्थात् काम (वासना) ही क्रोध का कारण है और यह रजोगुण से उत्पन्न होती है।
वासना का चक्र बड़ा सूक्ष्म है —
इंद्रिय-संपर्क- सुख का अनुभव- पुनः अनुभव की लालसा- वासना- आसक्ति- बंधन।
यह चक्र अनंत तक चलता है जब तक व्यक्ति विवेक से इसे पहचानकर रोक न दे।
4 इच्छा और वासना की दार्शनिक व्याख्या
भारतीय दृष्टिकोण
भारतीय दर्शन में इच्छा को प्रकृति की शक्ति माना गया है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति भी इच्छा से हुई- एकोऽहम् बहुस्याम् मैं एक हूँ बहुत हो जाऊँ यह सृष्टि की प्रथम इच्छा थी।
लेकिन जब यही शक्ति अज्ञान से जुड़ती है, तब यह वासना बन जाती है।
योगदर्शन कहता है- वासना ही संस्कारों का कारण है और संस्कार ही पुनर्जन्म के बंधन का।
इस प्रकार वासना को केवल नैतिक दोष नहीं बल्कि आध्यात्मिक अंधकार माना गया है।
बौद्ध दृष्टिकोण
गौतम बुद्ध ने कहा- तृष्णा दुःख का मूल है।
बौद्ध दर्शन में इच्छा तृष्णा को संसारिक दुखों का प्रमुख कारण बताया गया है।
मुक्ति का मार्ग तृष्णा-निरोध से होकर गुजरता है- यानी इच्छा का अंत ही निर्वाण है।
ग पश्चिमी दृष्टिकोण
फ्रॉयड के अनुसार, मनुष्य के भीतर दो मुख्य शक्तियाँ होती हैं- काम शक्ति और मृत्यु प्रवृत्ति।
फ्रॉयड ने माना कि मनुष्य की अधिकतर मानसिक क्रियाएँ कामनाओं वासना से प्रेरित होती हैं।
वहीं आधुनिक मानवतावादी मनोविज्ञानी मास्लो ने इच्छा को विकास की सीढ़ी माना- भोजन, सुरक्षा, प्रेम सम्मान से लेकर आत्म-साक्षात्कार तक।
5 इच्छा का सकारात्मक पक्ष
यद्यपि आध्यात्मिक दृष्टि से इच्छा को बंधन का कारण कहा गया है फिर भी जीवन में उसका एक अत्यंत रचनात्मक पक्ष है।
इच्छा ही मनुष्य को कर्मठ परिश्रमी और लक्ष्य-सचेत बनाती है। यदि इच्छा न हो तो कोई कलाकार सृजन नहीं करेगा कोई वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं करेगा और कोई साधक साधना नहीं करेगा।
संत कबीर ने कहा-
इच्छा बिन जीवन अधूरा पर इच्छा में मत हो अधीर।
अर्थात् इच्छा जीवन का ईंधन है परंतु जब यह अधीरता में बदल जाए तो जीवन को जला देती है।
6 वासना का नकारात्मक प्रभाव
वासना की प्रकृति स्वार्थी और सीमित होती है। यह व्यक्ति को अपने सुख तक सीमित कर देती है और दूसरों के दुख के प्रति असंवेदनशील बना देती है।
वासना के तीन प्रमुख परिणाम हैं-
- आसक्ति- व्यक्ति किसी वस्तु व्यक्ति या सुख के प्रति बंध जाता है।
- भय- जो मिला है उसे खोने का भय सताने लगता है।
- क्रोध- वासना की पूर्ति में बाधा आने पर व्यक्ति क्रोध से भर जाता है।
इन तीनों से मानसिक शांति नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया —
वासना विनाशाय साधना आवश्यक है।
7 इच्छा का नियंत्रण और रूपांतरण
इच्छा को नष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि यह जीवन की मूल शक्ति है। लेकिन इसे संयम और विवेक द्वारा शुद्ध किया जा सकता है।
संस्कृत में इसे काम का कहा गया है- यानी वासना को ऊर्जा में बदल देना।
योग और ध्यान के अभ्यास से यह संभव है।
इच्छा का रूपांतरण तीन चरणों में होता है-
- सजगता- यह पहचानना कि मेरे भीतर कौन-सी इच्छा या वासना सक्रिय है।
- संयम- उसे बिना दमन के देखना पर उसका दास न बनना।
- परिवर्तन- उस ऊर्जा को सृजन, सेवा या साधना में बदल देना।
रामकृष्ण परमहंस ने कहा-
वासना को मारो मत उसे माँ काली के चरणों में अर्पित करो।
अर्थात् अपनी इच्छाओं को दमन न करो बल्कि उन्हें ईश्वर की ओर मोड़ो। यही सच्चा संयम है।
8 इच्छा और वासना का सामाजिक प्रभाव
समाज की संरचना भी इच्छाओं के स्वरूप पर निर्भर करती है।
जब समाज की इच्छाएँ सामूहिक कल्याण की ओर होती हैं तब वह संस्कृति और सभ्यता को जन्म देती है।
परंतु जब समाज की ऊर्जा वासना में बदल जाती है यानी भोग उपभोग और प्रतिस्पर्धा में डूब जाती है तब पतन शुरू होता है।
आज का उपभोक्तावादी युग वासना की संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है। विज्ञापन मनोरंजन और सोशल मीडिया मनुष्य के मन में निरंतर नयी इच्छाएँ पैदा कर रहे हैं।
लोग संतोष भूलकर अधिक पाने की दौड़ में लगे हैं।
परिणाम, तनाव, ईर्ष्या, अवसाद और आत्मविस्मृति।
9 इच्छा और आध्यात्मिक मुक्ति
आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ी बाधा वासना है।
योगसूत्र कहता है- योगः चित्तवृत्ति निरोधः।
अर्थात् जब मन की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं तब योग की अवस्था आती है।
इच्छा भी एक वृत्ति है- जब वह शांत होती है तभी आत्मा का साक्षात्कार संभव है।
बुद्ध ने तृष्णा का अंत ही निर्वाण बताया, वहीं गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं
यः कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्प्रजहाति।
जो व्यक्ति मन में उत्पन्न सभी कामनाओं को त्याग देता है, वही स्थिरप्रज्ञ होता है।
इस त्याग का अर्थ दमन नहीं बल्कि बोधपूर्ण जागरूकता है।
जब मनुष्य समझ जाता है कि सुख किसी बाहरी वस्तु में नहीं बल्कि अपने भीतर है तभी इच्छा की जड़ सूख जाती है।
10 इच्छा की शुद्धि के उपाय
- ध्यान और आत्मनिरीक्षण- प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठकर अपनी इच्छाओं को देखना कौन-सी इच्छा मेरे जीवन में शांति ला रही है और कौन-सी अशांति?
- संतोष का अभ्यास- जो कुछ मिला है उसके प्रति कृतज्ञ रहना।
- सेवा का भाव- अपनी इच्छाओं को दूसरों के कल्याण से जोड़ना।
- सत्संग और स्वाध्याय- अच्छे विचारों, ग्रंथों और लोगों के संपर्क में रहना।
- संयम का पालन- इंद्रियों को मनमानी न करने देना।
- सकारात्मक लक्ष्य- इच्छाओं को आत्मविकास और समाजोपयोगी दिशा में मोड़ना।
11 दमन नहीं आवश्यक है
इच्छाओं का दमन करने से वे समाप्त नहीं होतीं वे अवचेतन में जाकर और प्रबल रूप में लौट आती हैं।
अतः उनका रूपांतरण आवश्यक है।
कला, संगीत, साहित्य, सेवा या साधना ये सब वासना की ऊर्जा को दिव्यता में बदलने के श्रेष्ठ माध्यम हैं।
जैसे बिजली यदि नियंत्रित की जाए तो प्रकाश देती है और यदि अनियंत्रित हो तो जलाती है वैसे ही इच्छा भी नियंत्रित होने पर जीवन को आलोकित करती है।
12 निष्कर्ष
इच्छा और वासना दोनों जीवन की ऊर्जा हैं परंतु दिशा का अंतर इन्हें विपरीत परिणामों तक ले जाता है।
इच्छा जब विवेक और संयम से युक्त होती है तो वह आत्म-विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
वासना जब अज्ञान और मोह से ग्रसित होती है तो वह बंधन और पीड़ा का कारण बनती है।
मनुष्य का कार्य इच्छा को समाप्त करना नहीं बल्कि उसे शुद्ध और रूपांतरित करना है।
इच्छा से वासना की ओर नहीं बल्कि वासना से प्रेम और करुणा की ओर बढ़ना ही सच्ची साधना है।
इसी में मनुष्य की मुक्ति है-
जब तक इच्छा है तब तक यात्रा है जब इच्छा शुद्ध हो जाती है तब वही यात्रा ईश्वर तक पहुँचती है।
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