आत्म-स्वीकृति- स्वयं को अपनाने की आध्यात्मिक कला
![]() |
आत्म बल के लिए साधना करते हुए |
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
प्रस्तावना-
1 आत्म-स्वीकृति का अर्थ
आत्म-स्वीकृति का अर्थ है अपने शरीर मन भावनाओं विचारों और अनुभवों को पूर्ण रूप से स्वीकारना बिना किसी निर्णय या तुलना के।यह स्वयं के प्रति प्रेम और करुणा का भाव है। जब हम अपनी कमियों को भी अपनी यात्रा का हिस्सा मान लेते हैं तब भीतर से एक गहरी शांति और आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। स्वीकृति आत्मा की वह खिड़की है जिससे प्रकाश भीतर प्रवेश करता है।
2 आत्म-स्वीकृति और आत्म-सम्मान में अंतर
कई लोग आत्म-स्वीकृति को आत्म-सम्मान से भ्रमित कर लेते हैं जबकि दोनों में सूक्ष्म अंतर है। आत्म-स्वीकृति आत्म-सम्मान की जड़ है। जब व्यक्ति स्वयं को स्वीकारता है तभी सच्चा सम्मान उत्पन्न होता है।
3 आत्म-स्वीकृति की आवश्यकता क्यों है
आज का युग प्रतिस्पर्धा, तुलना और आलोचना का युग है। हर व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं के बोझ तले दबा हुआ है। ऐसे में आत्म-स्वीकृति मानसिक और भावनात्मक संतुलन की कुंजी है।
- स्वयं से प्रेम की शुरुआत आत्म-स्वीकृति से होती है।
- मानसिक शांति और आत्म-संतुलन प्राप्त होता है।
- भय और अपराध-बोध समाप्त होता है।
- दूसरों के प्रति सहानुभूति बढ़ती है।
- सच्चा आत्म-परिवर्तन तभी संभव होता है जब हम स्वयं को स्वीकारते हैं।
4 आत्म-स्वीकृति का आध्यात्मिक दृष्टिकोण
आध्यात्मिक रूप से आत्म-स्वीकृति का अर्थ है अपने भीतर की दिव्यता को पहचानना और यह समझना कि मैं अपूर्ण नहीं बल्कि एक विकसित होती चेतना हूँ। उपनिषदों में कहा गया है अहं ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूँ। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को उसी ईश्वरीय अंश के रूप में स्वीकार करता है तभी वह पूर्णता का अनुभव करता है। आत्म-स्वीकृति वह क्षण है जब आत्मा कहती है मैं जैसा हूँ वैसा ठीक हूँ क्योंकि मैं बढ़ रहा हूँ सीख रहा हूँ विकसित हो रहा हूँ।
5 आत्म-स्वीकृति की यात्रा
आत्म-स्वीकृति एक साधना है जो धीरे-धीरे विकसित होती है।
1 आत्म-निरीक्षण-
2 आत्म-स्वीकार-
3 आत्म-संवाद-
4 आत्म-क्षमाशीलता-
5 आत्म-प्रेम-
6 आत्म-स्वीकृति और ध्यान का संबंध
ध्यान आत्म-स्वीकृति की जड़ में है। ध्यान हमें यह अनुभव कराता है कि हम अपने विचारों नहीं बल्कि विचारों के साक्षी हैं। जब साक्षीभाव विकसित होता है तो हम अपने दोषों को भी निष्पक्ष दृष्टि से देख पाते हैं। यही दृष्टि आत्म-स्वीकृति में परिवर्तित होती है। ध्यान वह दर्पण है जिसमें आत्मा स्वयं को बिना मुखौटे के देखती है।
7 आत्म-स्वीकृति के लाभ
मानसिक और भावनात्मक स्तर पर-
- आत्म-आलोचना कम होती है
- तनाव और चिंता घटते हैं
- आत्म-संतुलन और शांति बढ़ती है
सामाजिक स्तर पर-
- दूसरों की गलतियों को स्वीकारने की क्षमता आती है
- रिश्ते सहज और प्रेमपूर्ण बनते हैं
आध्यात्मिक स्तर पर-
- व्यक्ति अपने भीतर की दिव्यता से जुड़ता है
- आत्म-साक्षात्कार का मार्ग खुलता है
8 आत्म-स्वीकृति में आने वाली बाधाएँ
कई बार हम स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि-
- अहंकार/ मैं हमेशा सही हूँ।
- आलोचना का भय- लोग क्या कहेंगे?
- अतीत का अपराध-बोध
- तुलना की आदत
- स्वयं के प्रति कठोरता
इन बाधाओं से निकलने का उपाय है करुणा, सजगता और आत्म-प्रेम।
9 आत्म-स्वीकृति और आत्म-परिवर्तन का संबंध
स्वीकृति का अर्थ यह नहीं कि हम जैसे हैं वैसे ही बने रहें। बल्कि इसका अर्थ है स्वयं को जैसे हैं वैसे देखना, ताकि सुधार सहजता से हो सके। जैसे ही हम स्वयं को स्वीकारते हैं हमारे भीतर परिवर्तन का द्वार खुल जाता है क्योंकि तब परिवर्तन भय से नहीं समझ से होता है। जो स्वयं को स्वीकारता है वही वास्तव में बदलता है।
10 आत्म-स्वीकृति विकसित करने के उपाय
- दैनिक आत्म-संवाद करें-हर दिन अपने भीतर कहें मैं पर्याप्त हूँ।
- डायरी लिखें-अपनी भावनाओं को लिखना आत्म-स्वीकृति की दिशा में बड़ा कदम है।
- ध्यान करें-मौन में बैठें और अपने भीतर की आवाज़ सुनें।
- कृतज्ञता का अभ्यास करें-अपने जीवन में जो है उसके प्रति आभार जताएँ।
- आत्म-प्रेम की आदत डालें-अपने लिए समय निकालें यह आत्मा का सम्मान है।
11 आत्म-स्वीकृति और दूसरों की दृष्टि
जब आप स्वयं को स्वीकारना सीखते हैं तो दूसरों की राय का प्रभाव कम होने लगता है। अब आप बाहरी स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहते क्योंकि आपको अपनी आत्मा की स्वीकृति प्राप्त होती है। जो स्वयं से प्रसन्न है उसे किसी प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती।
12 आत्म-स्वीकृति का आध्यात्मिक फल
आत्म-स्वीकृति का अंतिम परिणाम है आत्म-साक्षात्कार। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को पूर्णता से स्वीकार लेता है तो वह मैं और ईश्वर के बीच के भेद को मिटा देता है। तभी उसे यह अनुभूति होती है कि मैं वही चेतना हूँ जो सृष्टि के हर कण में विद्यमान है।
13 जीवन में आत्म-स्वीकृति के उदाहरण
- जब आप असफल होकर भी मुस्कुराते हैं और सीखते हैं वह आत्म-स्वीकृति है।
- जब आप अपनी कमियों को भी ईश्वर की योजना समझते हैं वह आत्म-स्वीकृति है।
- जब आप दूसरों के निर्णयों से ऊपर उठते हैं वह आत्म-स्वीकृति है।
ऐसे क्षणों में आत्मा अपने मूल स्वरूप को पहचानने लगती है।
14 निष्कर्ष
आत्म-स्वीकृति कोई स्वार्थ नहीं यह आत्मा की विनम्रता है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति स्वयं से संघर्ष करना छोड़ देता है। तब जीवन एक सहज प्रवाह बन जाता है जहाँ कुछ भी नकारात्मक नहीं लगता सब अनुभवों का हिस्सा बन जाता है। स्वयं को अपनाना ही ईश्वर को अपनाना है क्योंकि आत्मा और ईश्वर अलग नहीं एक ही प्रकाश हैं।

0 टिप्पणियाँ