रिश्तों में बार-बार टकराव क्यों?

रिश्तों में टकराव क्यों?


प्रस्तावना

मानव जीवन रिश्तों का ताना-बाना है। हम जन्म लेते ही किसी न किसी संबंध से जुड़ जाते हैं माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, जीवनसाथी, सहकर्मी। रिश्ते हमें सुरक्षा, प्रेम, सहारा और पहचान देते हैं। फिर भी एक प्रश्न अक्सर मन को कचोटता है रिश्तों में बार-बार टकराव क्यों होता है?

क्यों वही लोग, जिन्हें हम सबसे अधिक चाहते हैं हमारे दुःख का कारण बन जाते हैं? क्यों छोटी-छोटी बातों पर विवाद, गलतफहमियाँ और दूरी बढ़ने लगती है?

यह लेख रिश्तों में लगातार होने वाले संघर्षों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और भावनात्मक कारणों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, साथ ही समाधान भी सुझाता है।

1 अपेक्षाएँ- टकराव की जड़

हर रिश्ता अपेक्षाओं पर टिका होता है। जब हम किसी से जुड़ते हैं तो अनजाने में कई उम्मीदें बना लेते हैं-

  • वह हमें समझे
  • हमारी भावनाओं का सम्मान करे
  • हमारी प्राथमिकता बने
  • हमारी सोच से सहमत रहे

समस्या तब शुरू होती है जब हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं।

सच्चाई यह है कि अपेक्षा जितनी अधिक होगी निराशा की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

रिश्तों में बार-बार टकराव का सबसे बड़ा कारण यही है कि हम अपनी उम्मीदों को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं करते बल्कि मन ही मन मान लेते हैं कि सामने वाला समझ जाएगा।

2 संवाद की कमी

संवाद किसी भी संबंध की जीवनरेखा है। जब संवाद रुकता है तो अनुमान और भ्रम बढ़ते हैं।

  • बात न करना
  • भावनाएँ छिपाना
  • मन की बात न कहना
  • गुस्से में चुप्पी साध लेना

ये सभी स्थितियाँ रिश्ते में दूरी पैदा करती हैं।

महान मनोवैज्ञानिक Carl Rogers का कहना था-

सच्चा संवाद तब होता है जब हम बिना निर्णय के सामने वाले को सुनते हैं।

जब हम सुनने की बजाय केवल जवाब देने की तैयारी करते हैं तो टकराव बढ़ता है।

3 अहंकार 

अहंकार वह अदृश्य दीवार है जो दो लोगों के बीच खड़ी हो जाती है।

  • पहले वही माफी मांगे।
  • मैं क्यों झुकूं?
  • गलती उसकी है।

जब दोनों पक्ष अपने-अपने अहंकार में अड़े रहते हैं तो छोटा विवाद बड़ा रूप ले लेता है।

रिश्तों में बार-बार टकराव इसलिए भी होता है क्योंकि हम सही साबित होना चाहते हैं संबंध बचाना नहीं।

4 भावनात्मक अपरिपक्वता

कई बार व्यक्ति अपनी भावनाओं को समझ नहीं पाता।

  • गुस्सा
  • जलन
  • असुरक्षा
  • हीनभावना

ये सभी भावनाएँ भीतर दबती रहती हैं और किसी छोटी घटना पर विस्फोट कर देती हैं।

यदि व्यक्ति आत्म-जागरूक नहीं है तो वह हर परिस्थिति में दूसरे को दोष देगा।

5 तुलना और प्रतिस्पर्धा

आज का समाज तुलना पर आधारित है।

  • उसके पति ऐसा करते हैं।
  • उसकी पत्नी ज्यादा समझदार है।
  • तुम दूसरों जैसे क्यों नहीं?

तुलना रिश्ते को कमजोर करती है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से तुलना व्यक्ति में हीनता या श्रेष्ठता दोनों भाव पैदा कर सकती है और दोनों ही टकराव को जन्म देते हैं।

6 समय की कमी और डिजिटल दूरी

तकनीक ने हमें जोड़ा भी है और दूर भी किया है।

  • मोबाइल में व्यस्त रहना
  • सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताना
  • परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय न बिताना

इन सबके कारण भावनात्मक दूरी बढ़ती है।

जब संवाद डिजिटल हो जाए और संवेदनाएँ कम हो जाएँ तो टकराव स्वाभाविक है।

7 अधूरी अपेक्षाएँ और बचपन के अनुभव

अक्सर हमारे वर्तमान संघर्ष हमारे अतीत से जुड़े होते हैं।

यदि बचपन में-

  • असुरक्षा
  • उपेक्षा
  • कठोर अनुशासन
  • भावनात्मक दूरी

का अनुभव हुआ हो तो व्यक्ति वयस्क संबंधों में भी असुरक्षित व्यवहार करता है।

वह अधिक चिपकू अधिक नियंत्रक या अत्यधिक संवेदनशील हो सकता है।

8 विश्वास की कमी

विश्वास किसी भी रिश्ते की नींव है।

जब विश्वास डगमगाता है-

  • संदेह बढ़ता है
  • निगरानी शुरू होती है
  • झूठ और छिपाव बढ़ते हैं

और परिणामस्वरूप बार-बार टकराव होता है।

9 संवाद शैली का अंतर

कुछ लोग सीधे बोलते हैं कुछ संकेतों में।
कुछ भावुक होते हैं कुछ तार्किक।

जब दो भिन्न व्यक्तित्व बिना समझे संवाद करते हैं तो गलतफहमी बढ़ती है।

10 समाधान- टकराव से समझ तक

अब प्रश्न है क्या किया जाए?

1 आत्मविश्लेषण करें

पहले खुद से पूछें-

  • क्या मेरी अपेक्षाएँ वास्तविक हैं?
  • क्या मैं सामने वाले को सच में सुनता/सुनती हूँ?

2 खुला संवाद अपनाएँ

शांत समय में बात करें। आरोप नहीं अनुभव साझा करें।

3 अहंकार छोड़ें

झुकना हार नहीं संबंध बचाना है।

4 सीमाएँ तय करें

हर रिश्ता स्वस्थ सीमाओं पर टिका होता है।

5 क्षमा करना सीखें

क्षमा रिश्ते की मरहम है।

11 रिश्तों का आध्यात्मिक आयाम

जब हम संबंध को अधिकार की जगह कर्तव्य मानते हैं तो टकराव कम होता है।

रिश्ते स्वामित्व नहीं, सहयोग का नाम हैं।

12 निष्कर्ष

रिश्तों में बार-बार टकराव क्यों होता है?
क्योंकि हम सुनने से ज्यादा बोलते हैं, समझने से ज्यादा अपेक्षा रखते हैं और प्रेम से ज्यादा अहंकार को महत्व देते हैं।

यदि हम संवाद, संवेदनशीलता और आत्म-जागरूकता को अपनाएँ, तो टकराव समझ में बदल सकता है।

रिश्ते पूर्ण नहीं होते पर प्रयास से सुंदर बन सकते हैं।

पूछे जाने वाले प्रश्न 

1 रिश्तों में सबसे ज्यादा झगड़े किस कारण होते हैं?

उत्तर- अधिकतर झगड़े अपेक्षाओं, संवाद की कमी और अहंकार के कारण होते हैं।

2 क्या बार-बार टकराव सामान्य है?

उत्तर- हाँ लेकिन यदि संवाद न हो तो यह दूरी में बदल सकता है।

3 रिश्तों में अहंकार कैसे कम करें?

उत्तर- आत्मविश्लेषण, क्षमा और समझ विकसित करके।

4 क्या हर विवाद रिश्ते को कमजोर करता है?

उत्तर- नहीं स्वस्थ संवाद से विवाद समझ में बदल सकता है।

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

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