कर्म संस्कार और अंतर्दर्शन का आपसी संबंध
प्रस्तावना
मानव जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं है बल्कि यह चेतना की यात्रा है। हम जो सोचते हैं जो करते हैं और जो अनुभव करते हैं ये सब मिलकर हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। भारतीय दर्शन में तीन मूलभूत अवधारणाएँ हैं- कर्म, संस्कार और अंतर्दर्शन। ये तीनों मिलकर मानव जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करते हैं।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हुए बताते हैं कि मनुष्य कर्म किए बिना रह नहीं सकता। वहीं उपनिषद आत्मज्ञान और आत्मचिंतन को मोक्ष का मार्ग बताते हैं।
इस लेख में हम गहराई से समझेंगे कि कर्म कैसे संस्कार बनते हैं संस्कार कैसे हमारे भविष्य के कर्मों को प्रभावित करते हैं और अंतर्दर्शन किस प्रकार इस चक्र को बदल सकता है।
1 कर्म का दार्शनिक अर्थ
1 कर्म की परिभाषा
कर्म शब्द संस्कृत धातु कृ से बना है जिसका अर्थ है- करना। परंतु दार्शनिक दृष्टि से कर्म केवल शारीरिक क्रिया नहीं है।
कर्म तीन स्तरों पर होता है-
- मनसा (विचार से)
- वाचा (वाणी से)
- कर्मणा (शारीरिक क्रिया से)
जब हम किसी के प्रति ईर्ष्या का विचार रखते हैं वह भी कर्म है। जब हम किसी को कठोर शब्द कहते हैं वह भी कर्म है।
1 कर्म के प्रकार
भारतीय दर्शन में कर्म को तीन भागों में विभाजित किया गया है-
- संचित कर्म– पिछले जन्मों के संचित कर्म
- प्रारब्ध कर्म– जो वर्तमान जीवन में फल दे रहे हैं
- क्रियमाण कर्म– जो हम अभी कर रहे हैं
स्वामी विवेकानंद ने कहा था-
कर्म ही मनुष्य को महान बनाता है।
2 संस्कार की गहराई
1 संस्कार क्या हैं?
संस्कार वे मानसिक छापें हैं जो हर अनुभव और कर्म से मन में अंकित होती हैं।
जैसे मिट्टी पर बार-बार चलने से पगडंडी बन जाती है वैसे ही मन में बार-बार दोहराए गए विचार और कर्म संस्कार बन जाते हैं।
2 संस्कार और आदत
हर आदत एक संस्कार की अभिव्यक्ति है।
- क्रोध की आदत→ क्रोध का संस्कार
- करुणा की आदत→ दया का संस्कार
महात्मा गांधी का जीवन सत्य और अहिंसा के संस्कारों का उदाहरण है।
3 अंतर्दर्शन-
1 अंतर्दर्शन का अर्थ
अंतर्दर्शन का अर्थ है- अपने भीतर देखना।
यह आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया है।
जब व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को देखने लगता है तब वह स्वयं को समझने लगता है।
2 आत्म-परीक्षण का महत्व
रामण महर्षि ने मैं कौन हूँ? का प्रश्न पूछकर आत्म-जागरण का मार्ग दिखाया।
गौतम बुद्ध ने ध्यान और निरीक्षण के माध्यम से मन को समझने का मार्ग बताया।
4 कर्म से संस्कार बनने की प्रक्रिया
जब कोई कार्य बार-बार किया जाता है तो वह अवचेतन में स्थिर हो जाता है।
उदाहरण-
यदि कोई व्यक्ति रोज़ झूठ बोलता है तो झूठ बोलना उसका स्वभाव बन जाता है।
इस प्रकार-
कर्म- आदत- संस्कार
5 संस्कार से कर्म बनने की प्रक्रिया
संस्कार हमारे अवचेतन मन में संग्रहित रहते हैं।
जब कोई परिस्थिति आती है तो वही संस्कार प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होते हैं।
उदाहरण-
यदि किसी व्यक्ति में करुणा का संस्कार है तो वह दुखी व्यक्ति को देखकर सहायता
करेगा।
इस प्रकार-
संस्कार- प्रतिक्रिया- कर्म
6 अंतर्दर्शन की परिवर्तनकारी शक्ति
अंतर्दर्शन हमें यह देखने में सहायता करता है कि हम किस संस्कार से प्रेरित होकर कर्म कर रहे हैं।
जब हम सजग हो जाते हैं तो हम अपने संस्कारों को बदल सकते हैं।
यदि क्रोध आता है और हम उसे पहचान लेते हैं तो हम उसे रोक सकते हैं।
7 कर्म-संस्कार-अंतर्दर्शन का चक्र
यह एक सतत चक्र है-
कर्म- संस्कार- पुनः कर्म
अंतर्दर्शन इस चक्र को तोड़ने की कुंजी है।
8 शिक्षा और चरित्र निर्माण
यदि बच्चों को प्रारंभ से ही आत्मचिंतन सिखाया जाए तो वे केवल परीक्षा में सफल नहीं बल्कि जीवन में सफल होंगे।
संस्कार आधारित शिक्षा ही समाज को मजबूत बनाती है।
9 आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आज का मनुष्य तनाव, प्रतिस्पर्धा और भ्रम में जी रहा है।
अंतर्दर्शन उसे मानसिक शांति देता है।
सकारात्मक कर्म उसे आत्मविश्वास देता है।
सकारात्मक संस्कार उसे स्थिरता देते हैं।
10 व्यावहारिक अभ्यास
1 दैनिक आत्म-विश्लेषण
दिन समाप्त होने पर स्वयं से पूछें-
- आज मैंने कौन-से अच्छे कर्म किए?
- कहाँ गलती हुई?
2 ध्यान अभ्यास
प्रतिदिन 10–15 मिनट शांति से बैठें।
3 सकारात्मक संकल्प
हर सुबह संकल्प लें-
मैं सत्य और करुणा का पालन करूंगा।
11 गहन दार्शनिक निष्कर्ष
कर्म जीवन की बाहरी अभिव्यक्ति है।
संस्कार जीवन की आंतरिक छाप है।
अंतर्दर्शन जीवन की चेतना है।
जब ये तीनों संतुलित होते हैं तब जीवन समरस हो जाता है।
समापन
कर्म, संस्कार और अंतर्दर्शन एक ही वृक्ष की तीन शाखाएँ हैं।
कर्म बीज है।
संस्कार जड़ है।
अंतर्दर्शन प्रकाश है।
जब मनुष्य सजग होकर कर्म करता है सकारात्मक संस्कार विकसित करता है और नियमित अंतर्दर्शन करता है तब उसका जीवन अर्थपूर्ण, संतुलित और जागरूक बनता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
1 क्या कर्म से संस्कार बदल सकते हैं?
हाँ, सजग और सकारात्मक कर्म से संस्कार बदलते हैं।
2 अंतर्दर्शन क्यों आवश्यक है?
यह आत्म-सुधार और आत्म-ज्ञान का मार्ग है।
3 क्या संस्कार जन्म से आते हैं?
कुछ संस्कार पूर्व अनुभवों से आते हैं परंतु वर्तमान कर्मों से उन्हें परिवर्तित
किया जा सकता है।

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