एक शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन क्यों आवश्यक है?

कक्षा में शिक्षक द्वारा अध्यापन करवाते हुए।

शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन केवल एक वैचारिक अवधारणा नहीं बल्कि प्रभावी शिक्षण की मूल आवश्यकता है। जब कोई शिक्षक स्वयं के विचारों, भावनाओं, व्यवहार और शिक्षण पद्धति का आत्म-मूल्यांकन करता है, तब वह वास्तव में शिक्षा की आत्मा को समझ पाता है। आज के प्रतिस्पर्धी और तकनीक-प्रधान युग में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं है बल्कि वह विद्यार्थियों के चरित्र, नैतिकता और व्यक्तित्व के निर्माण का आधार होता है। इसलिए शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन एक ऐसा उपकरण है जो उसे निरंतर सुधार, संतुलन और उत्कृष्टता की दिशा में आगे बढ़ाता है।

अंतर्दर्शन का अर्थ और उसका शैक्षिक महत्व

अंतर्दर्शन का अर्थ है स्वयं के भीतर झांकना और अपने विचारों व कार्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना। यह आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है-

  • क्या मैं सही दिशा में कार्य कर रहा हूँ?
  • क्या मेरा व्यवहार विद्यार्थियों के हित में है?
  • क्या मेरी शिक्षण शैली सभी छात्रों को समान रूप से लाभ पहुँचा रही है?

शिक्षक यदि नियमित रूप से इन प्रश्नों पर विचार करे तो वह अपने पेशे को केवल नौकरी नहीं बल्कि एक साधना के रूप में देख पाएगा।

शिक्षक के व्यक्तित्व विकास में अंतर्दर्शन की भूमिका

1 आत्म-जागरूकता का विकास

जब शिक्षक अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को समझता है तब वह अपनी कमजोरियों को पहचान पाता है। उदाहरण के लिए यदि वह छोटी-सी गलती पर विद्यार्थियों पर क्रोधित हो जाता है तो अंतर्दर्शन उसे यह सोचने पर मजबूर करेगा कि कहीं उसका व्यक्तिगत तनाव तो इसका कारण नहीं।

2 नैतिक मूल्यों की मजबूती

शिक्षक विद्यार्थियों के लिए आदर्श होता है। उसका आचरण ही शिक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि शिक्षक स्वयं ईमानदार, अनुशासित और सहिष्णु होगा तो विद्यार्थी भी उन्हीं गुणों को अपनाएँगे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था-
सच्चा शिक्षक वही है जो स्वयं सीखना कभी बंद नहीं करता।

यह कथन स्पष्ट करता है कि शिक्षक का आत्म-चिंतन ही उसे आजीवन विद्यार्थी बनाए रखता है।

शिक्षण गुणवत्ता में सुधार

शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन शिक्षण गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करता है।

1 शिक्षण पद्धति की समीक्षा

क्या मेरी कक्षा रोचक है?
क्या विद्यार्थी सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं?
क्या मैं केवल परीक्षा-केन्द्रित पढ़ा रहा हूँ या जीवन-कौशल भी सिखा रहा हूँ?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने से शिक्षक अपनी पद्धति में सुधार कर सकता है।

2 फीडबैक को स्वीकार करने की क्षमता

अंतर्दृष्टि रखने वाला शिक्षक विद्यार्थियों और सहकर्मियों से मिलने वाले सुझावों को सकारात्मक रूप में लेता है। वह आलोचना को अवसर में बदल देता है।

विद्यार्थियों के साथ संबंधों में सुधार

1 सहानुभूति का विकास

जब शिक्षक स्वयं की सीमाओं को समझता है तो वह विद्यार्थियों की समस्याओं को भी संवेदनशीलता से समझ पाता है।

2 संवाद शैली में सुधार

अंतर्दर्शन यह सिखाता है कि शब्दों का चयन कितना महत्वपूर्ण है। सकारात्मक भाषा विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाती है, जबकि कठोर शब्द उनके मन में भय उत्पन्न कर सकते हैं।

मानसिक संतुलन और तनाव प्रबंधन

आज शिक्षक पर प्रशासनिक कार्य, परिणामों का दबाव और अभिभावकों की अपेक्षाएँ होती हैं। यदि वह आत्म-चिंतन नहीं करेगा तो तनाव बढ़ सकता है।

नियमित अंतर्दर्शन से शिक्षक यह पहचान सकता है कि कौन-सी परिस्थितियाँ उसके नियंत्रण में हैं और कौन-सी नहीं। इससे वह मानसिक संतुलन बनाए रखता है।

शिक्षा में नवाचार और रचनात्मकता

शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन नवाचार का स्रोत है। जब शिक्षक स्वयं से प्रश्न करता है- क्या मैं कुछ नया कर सकता हूँ? तभी नई शिक्षण तकनीकें जन्म लेती हैं।

डिजिटल युग में स्मार्ट बोर्ड, ऑनलाइन कक्षाएँ और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म का उपयोग तभी सार्थक है जब शिक्षक संतुलित दृष्टिकोण अपनाए। अंतर्दर्शन उसे तकनीक का सही उपयोग करना सिखाता है।

नेतृत्व क्षमता का विकास

एक शिक्षक केवल अध्यापक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और नेता भी होता है। अंतर्दर्शन से उसमें निर्णय क्षमता, निष्पक्षता और धैर्य विकसित होते हैं।

विद्यालय के वातावरण को सकारात्मक बनाए रखने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि वह आत्म-विश्लेषण करता रहेगा, तो वह अपने नेतृत्व कौशल को निरंतर बेहतर बना सकता है।

विद्यार्थियों में अंतर्दर्शन की प्रेरणा

शिक्षक जैसा व्यवहार करता है विद्यार्थी भी वैसा ही सीखते हैं। यदि शिक्षक अपनी गलतियों को स्वीकार करता है और सुधार का प्रयास करता है तो विद्यार्थी भी आत्म-मूल्यांकन की आदत विकसित करते हैं।

उदाहरण के लिए-

  • विद्यार्थियों से साप्ताहिक आत्म-चिंतन डायरी लिखवाना
  • कक्षा के अंत में आज हमने क्या सीखा? चर्चा करना
  • समूह गतिविधियों के बाद आत्म-मूल्यांकन करवाना

ये सभी उपाय विद्यार्थियों में अंतर्दृष्टि विकसित करते हैं।

डिजिटल युग में अंतर्दर्शन की बढ़ती आवश्यकता

आज सूचना की अधिकता है परंतु विवेक की कमी देखी जा रही है। शिक्षक यदि स्वयं डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता का मूल्यांकन नहीं करेगा तो विद्यार्थियों को सही दिशा नहीं दे पाएगा।

अंतर्दर्शन शिक्षक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वह तकनीक का उपयोग केवल दिखावे के लिए कर रहा है या वास्तविक शिक्षण सुधार के लिए।

आत्म-विश्वास और आत्म-स्वीकृति

जब शिक्षक अपनी शक्तियों और सीमाओं को स्वीकार करता है तो उसमें आत्म-विश्वास बढ़ता है। वह तुलना और प्रतिस्पर्धा से मुक्त होकर अपने कार्य में पूर्ण निष्ठा से जुड़ पाता है।

यह आत्म-स्वीकृति ही उसे एक संतुलित और प्रेरणादायक शिक्षक बनाती है।

निष्कर्ष

अंतर्दर्शन शिक्षक के जीवन का दर्पण है। यह दर्पण उसे उसकी कमियों का बोध कराता है और सुधार की दिशा दिखाता है। शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन केवल व्यक्तिगत विकास का साधन नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का माध्यम है।

जब शिक्षक आत्म-चिंतन करता है-

  • शिक्षण गुणवत्ता बेहतर होती है
  • छात्र-शिक्षक संबंध मजबूत होते हैं
  • मानसिक संतुलन बना रहता है
  • नेतृत्व क्षमता विकसित होती है

अंततः वही शिक्षक समाज का सच्चा निर्माता बनता है जो स्वयं को निरंतर सुधारने की प्रक्रिया में रखता है।

अक्षर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1 शिक्षक के लिए अंतर्दर्शन क्यों जरूरी है?

उत्तर- अंतर्दर्शन शिक्षक को अपनी शिक्षण शैली, व्यवहार और निर्णयों का मूल्यांकन करने में मदद करता है, जिससे वह बेहतर मार्गदर्शक बन पाता है।

2 क्या आत्म-चिंतन शिक्षण गुणवत्ता सुधारता है?

उत्तर- हाँ आत्म-चिंतन से शिक्षक अपनी कमियों को पहचानकर सुधार कर सकता है जिससे शिक्षण प्रभावी होता है।

3 शिक्षक विद्यार्थियों में अंतर्दर्शन कैसे विकसित करें?

उत्तर- दैनिक डायरी लेखन, समूह चर्चा और आत्म-मूल्यांकन गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों में अंतर्दृष्टि विकसित की जा सकती है।

4 क्या अंतर्दर्शन मानसिक तनाव कम करता है?

उत्तर- हाँ नियमित आत्म-विश्लेषण शिक्षक को भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।

5 क्या अंतर्दर्शन नेतृत्व क्षमता बढ़ाता है?

उत्तरहाँ आत्म-चिंतन से निर्णय क्षमता, धैर्य और निष्पक्षता विकसित होती है।

 लेखक- बद्री लाल गुर्जर

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