हम अपने ही मन से क्यों डरते हैं?

हम अपने ही मन से क्यों डरते हैं?


प्रस्तावना

मनुष्य का सबसे निकटतम साथी उसका अपना मन है फिर भी सबसे बड़ा डर भी अक्सर उसी से जुड़ा होता है। बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले विचारों, स्मृतियों, कल्पनाओं और आशंकाओं से हम घबराते हैं। यह विरोधाभास कि जो हमारा अपना है वही हमें भयभीत करता है मानव मनोविज्ञान का एक गहरा और जटिल पक्ष है। यह लेख इसी प्रश्न की गहराई में उतरता है हम अपने ही मन से क्यों डरते हैं?1 मन मित्र या शत्रु?

मन स्वभावतः न अच्छा है, न बुरा। वह एक उपकरण है सूचनाओं को संसाधित करने वाला, अनुभवों को अर्थ देने वाला। लेकिन जब मन पर नियंत्रण की जगह आदतें और अनियंत्रित प्रतिक्रियाएँ हावी हो जाती हैं तब वही मन शत्रु जैसा प्रतीत होने लगता है।

मन हमें सुरक्षित रखने के लिए चेतावनियाँ देता है पर वही चेतावनियाँ जब अतिशयोक्ति बन जाएँ तो डर का कारण बनती हैं।

2 डर का मनोवैज्ञानिक आधार

डर मूलतः एक रक्षा-तंत्र है। यह हमें संभावित खतरों से बचाने के लिए विकसित हुआ। लेकिन आधुनिक जीवन में खतरे शारीरिक कम और मानसिक अधिक हैं असफलता का भय, अस्वीकार किए जाने का डर, तुलना, अपेक्षाएँ।

मन पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य की आशंकाएँ रचता है। यही कल्पनाएँ धीरे-धीरे भय का रूप ले लेती हैं।

3 अतीत की स्मृतियाँ और उनका बोझ

हमारा मन अतीत की घटनाओं को संग्रहित करता है। दुखद अनुभव, अपमान, असफलताएँ ये सब मन में गहरी छाप छोड़ते हैं। जब भी वर्तमान में कोई मिलती-जुलती स्थिति आती है मन पुरानी पीड़ा को फिर से जगा देता है।

इस पुनरावृत्ति से मन डरने लगता है कि कहीं वही पीड़ा दोबारा न हो जाए।

4 भविष्य की अनिश्चितता

मन निश्चितता चाहता है। लेकिन जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। भविष्य के बारे में सोचते समय मन संभावनाओं की बजाय आशंकाओं पर अधिक ध्यान देता है।

अगर असफल हो गया तो? 

अगर लोग क्या कहेंगे?

ये प्रश्न डर को जन्म देते हैं।

5 आत्म-संवाद- भीतर चलती बातचीत

मन में लगातार चलने वाला आत्म-संवाद हमारे डर को बढ़ाता या घटाता है। नकारात्मक आत्म-संवाद मैं पर्याप्त नहीं हूँ मुझसे नहीं होगा मन को अपना ही विरोधी बना देता है।

6 सामाजिक तुलना और अपेक्षाएँ

आज का युग तुलना का युग है। सोशल मीडिया प्रतिस्पर्धा और सामाजिक मानदंड मन पर दबाव डालते हैं। जब हम खुद को दूसरों से कम आँकते हैं तो मन डर से भर जाता है असफल होने का पीछे रह जाने का।

7 नियंत्रण की चाह और उसका अभाव

मन नियंत्रण चाहता है परिस्थितियों पर, परिणामों पर लोगों पर। जब नियंत्रण संभव नहीं होता तो मन असहज हो जाता है और डर पैदा होता है।

8 अज्ञात का भय

मन परिचित चीज़ों में सुरक्षा महसूस करता है। अज्ञात रास्ते नए निर्णय बदलाव ये सब मन को अस्थिर करते हैं। इस अस्थिरता से डर जन्म लेता है।

9 पूर्णता की लालसा

परफेक्शनिज़्म भी मन का ही खेल है। हर काम में पूर्णता की अपेक्षा मन पर बोझ डालती है। गलती की संभावना ही डर बन जाती है।

10 भावनाओं से पलायन

हम दुख, क्रोध, ईर्ष्या जैसी भावनाओं से बचना चाहते हैं। लेकिन जब हम उन्हें दबाते हैं वे मन में और गहराई से बैठ जाती हैं। दबाई गई भावनाएँ डर का रूप ले लेती हैं।

11 मन और पहचान का भ्रम

हम अपने विचारों को ही अपनी पहचान मान लेते हैं। मैं ऐसा ही हूँ यह मान्यता मन को कठोर बना देती है। जब विचार नकारात्मक होते हैं तो हम खुद से डरने लगते हैं।

12 अंतर्दर्शन का अभाव

जब हम अपने भीतर झाँकने से बचते हैं तो अनजाने में डर बढ़ता है। मन की गतिविधियों को समझे बिना हम उन्हें शत्रु मान लेते हैं।

13 अंतर्दर्शन- डर से दोस्ती की शुरुआत

अंतर्दर्शन मन को देखने की कला है बिना जजमेंट के। जब हम विचारों को आते-जाते देखते हैं तो उनसे दूरी बनती है। यही दूरी डर को कम करती है।

14. स्वीकार्यता का महत्व

मन में जो भी उठे उसे स्वीकार करना सीखें। विरोध करने से डर बढ़ता है स्वीकार करने से वह ढीला पड़ता है।

15 जागरूकता और वर्तमान क्षण

डर अक्सर भविष्य या अतीत में रहता है। वर्तमान क्षण में जागरूक रहना मन को स्थिर करता है।

16 ध्यान और श्वास का अभ्यास

ध्यान मन को प्रशिक्षित करता है। श्वास पर ध्यान केंद्रित करने से विचारों की तीव्रता कम होती है और डर शिथिल पड़ता है।

17 लेखन- मन का दर्पण

अपने डर को लिखना डायरी में कागज़ पर मन को हल्का करता है। लिखने से विचार स्पष्ट होते हैं।

18 करुणा स्वयं के प्रति

खुद के प्रति कठोर होना डर को बढ़ाता है। आत्म-करुणा मन को सुरक्षित महसूस कराती है।

19 साहस डर की अनुपस्थिति नहीं

साहस का अर्थ डर न होना नहीं बल्कि डर के साथ आगे बढ़ना है। जब हम मन के डर को समझते हैं तो वह बाधा नहीं रहता।

20 निष्कर्ष

हम अपने ही मन से इसलिए डरते हैं क्योंकि हम उसे समझने की बजाय उससे लड़ते हैं। मन को शत्रु नहीं साथी बनाना ही समाधान है। अंतर्दर्शन स्वीकार्यता और जागरूकता के माध्यम से हम मन के डर को मित्रता में बदल सकते हैं। जब मन समझ में आने लगता है तो डर अपनी शक्ति खो देता है और शांति का मार्ग खुलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1 मन से डर क्यों लगता है?
क्योंकि मन भविष्य की आशंकाएँ यादें और कल्पनाएँ बनाता है। ये सब मिलकर क्या होगा अगर…? जैसी चिंताएँ पैदा करते हैं।

2 ज़्यादा सोचने से डर क्यों बढ़ता है?
ओवरथिंकिंग में हम एक ही बात को बार-बार घुमाते हैं जिससे नकारात्मक विचार मजबूत हो जाते हैं और डर बढ़ता है।

3 क्या डर आना सामान्य है?
हाँ। डर एक सामान्य भावना है जो हमें सतर्क रखती है। समस्या तब होती है जब डर हमें रोकने लगे।

4 मन का डर असली होता है या कल्पना?
अक्सर कल्पना ज़्यादा होती है। हमारा मन संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सकता है।

5 मन के डर से कैसे निपटें?

  • विचारों को लिख लें स्पष्टता आती है
  • गहरी साँस/ध्यान करें
  • छोटे कदम लें, सब एक साथ नहीं
  • भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

अन्य लेख पढ़ें