अन्य लेख पढ़ें

मन के दर्पण में खुद को देखने की प्रक्रिया

मन के दर्पण में खुद को देखना

मन के दर्पण में खुद को देखने का अभ्यास करते हुए

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

भूमिका-

हमारा मन एक ऐसा दर्पण है जो बाहरी दुनिया को नहीं बल्कि हमारे भीतर भरे भावों, विचारों, धारणाओं, इच्छाओं और कमजोरियों को दिखाता है। यह वह दर्पण है जिसमें प्रतिबिंब केवल चेहरे का नहीं बल्कि व्यक्तित्व का, चरित्र का और आत्मा का दिखाई देता है।लेकिन समस्या यह है कि मन का यह दर्पण अक्सर धुंधला रहता है।धुंधला क्यों? क्योंकि-  हम जल्दी में होते हैं। हम चिंताओं से घिरे होते हैं। हम बाहरी दुनिया में इतने उलझ जाते हैं कि अंदर झांक ही नहीं पाते हम स्वयं के बारे में कठोर सत्य सुनना नहीं चाहते। इसीलिए मन के दर्पण में खुद को देखने की प्रक्रिया आवश्यक है। यह व्यक्ति को आत्मज्ञान, आत्मविश्वास, पवित्रता, शांति और उद्देश्यपूर्ण जीवन प्रदान करती है।

1 मन के दर्पण को साफ क्यों करना पड़ता है?

जिस प्रकार भरा हुआ धूल-मिट्टी से ढका दर्पण चेहरा साफ नहीं दिखाता उसी प्रकार-

मन का दर्पण भी कई परतों से ढक जाता है:

अहंकार की परत
डर की परत
दुख-स्मृतियों की परत
दूसरों की अपेक्षाओं की परत
नकारात्मक विचारों की परत

इन परतों को हटाए बिना व्यक्ति स्वयं को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता।

2 खुद को देखने के लिए जरूरी मानसिक अवस्थाएँ

1 आत्म-साहस-स्वयं को स्वीकारने का हौसला

खुद को देखने का मतलब केवल अच्छाइयों को देखना नहीं बल्कि-

गलतियों को
कमजोरियों को
पूर्वाग्रहों को
गलत धारणाओं को
असफलताओं के कारणों को भी देखना है इसके लिए आत्म-साहस अनिवार्य है।

2 मानसिक शांति

मन अशांत हो तो दर्पण कांपता रहता है।
ध्यान, गहरी साँसें, प्रकृति में समय बिताना मन को शांत करते हैं।

3 निर्भीक ईमानदारी

स्वयं के प्रति झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी खुद को नहीं पहचान सकता।

3 मन के दर्पण में स्वयं को देखने की पाँच-स्तरीय प्रक्रिया

यहाँ आत्म-चिंतन की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से विकसित प्रक्रिया दी गई है।

1 रुकना और मन को धीमा करना

हमारे जीवन में इतनी गति है कि हम अपने मन की आवाज ही नहीं सुनते।
पहला कदम है रुकना।

कैसे करें?

10 मिनट शांत बैठें
सांसों की गति धीमी करें
मोबाइल, टीवी, शोर सब बंद करें
अपनी चाल, विचार, प्रतिक्रियाएँ धीमी करें

धीमा मन गहराई से देख सकता है।

2 विचारों का निरीक्षण

मन के दर्पण में प्रतिबिंब देखने का सबसे सरल तरीका है विचारों को पकड़ना

यह अभ्यास करें-

एक कॉपी लें
10 मिनट में मन में आने वाले विचार लिखते जाएँ
किसी विचार को न रोकें, न बदलें
केवल देखते जाएँ

कुछ दिनों में आपको पता लगेगा-

80% विचार बेकार हैं
कुछ डर पर आधारित हैं
कुछ आदतें पुरानी हैं
कुछ विचार आपके नहीं दूसरों से ग्रहण किए हुए हैं यही स्पष्टता मन के दर्पण की सफाई है।

3 भावनाओं को पहचानना

मन का दर्पण केवल विचार नहीं दिखाता; वह भावनाएँ भी दिखाता है। लेकिन 90% लोग भावनाओं को पहचानना नहीं जानते।

खुद से पूछें-

मैं अभी क्या महसूस कर रहा हूँ?
इस भावना का स्रोत क्या है?
क्या यह भावना वास्तविक है या मेरी कल्पना का परिणाम?
मैं इस भावना से भाग क्यों रहा हूँ?

भावनाओं को पहचानकर आप मन में छिपे गहरे सत्य देखना शुरू कर देते हैं।

4 स्वयं से संवाद 

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

स्वयं से बातचीत कीजिए-

मैं वास्तव में क्या चाहता हूँ?
मेरी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
कौन-सी आदतें मुझे रोक रही हैं?
मुझे किस बात का डर है?
मेरे जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

धीरे-धीरे मन का दर्पण वास्तविक आपको दिखाने लगता है।

5 आत्म-स्वीकार

जब व्यक्ति अपने सच को देख लेता है तब दो रास्ते खुलते हैं-
या तो वह सच से भागे
या उसे स्वीकार कर आगे बढ़े

आत्म-स्वीकार का मतलब है

कमजोरियों को मानना
गलतियों को अपनाना
स्वयं को दोषी नहीं, शिक्षार्थी मानना
जो हैं उसे स्वीकारकर सुधारना
यही अपनापन आत्म-विकास की नींव है।

4 मन के दर्पण में क्या-क्या दिखाई देता है?

जब मन का दर्पण साफ हो जाता है व्यक्ति अपने जीवन के कई पहलू देखता है-

1 वास्तविक इच्छाएँ

बहुत-सी इच्छाएँ हमारी अपनी नहीं होतीं।

2 छिपे हुए डर

मन की गहराई में छिपे भय हमारा जीवन नियंत्रित करते हैं।

3 अधूरी आकांक्षाएँ

हमारी मनोकामनाएँ तब तक स्पष्ट नहीं होतीं जब तक मन का दर्पण साफ न हो।

4 आदतों का सच

व्यक्ति अपने व्यवहार का वास्तविक कारण तभी समझता है जब वह ध्यानपूर्वक स्वयं को देखता है।

5 रिश्तों में हमारी भूमिका

हम दूसरों को दोष देते हैं, पर मन का दर्पण बताता है कि गलती कहाँ-कहाँ हमारी भी थी।

5 मन के दर्पण में देखने से होने वाले लाभ

1 आत्म-जागरूकता बढ़ती है

व्यक्ति को पता चलता है कि वह कौन है।

2 निर्णय क्षमता मजबूत होती है

विचार स्पष्ट होने पर निर्णय भी स्पष्ट होते हैं।

3 तनाव कम होता है

भावनाओं को समझने से मानसिक दबाव घटता है।

4 रिश्ते स्वस्थ होते हैं

जब हम स्वयं को समझते हैं तब दूसरों को भी समझना आसान हो जाता है।

5 व्यक्तित्व का विकास होता है

आत्म-चिंतन हमें धीरे-धीरे एक श्रेष्ठ मानव बनाता है।

6 मन का दर्पण कैसे धुंधला होता है?

कुछ कारण जो आत्म-दृष्टि को कमजोर करते हैं-

अत्यधिक सोशल मीडिया।
तुलना की आदत।
बाहरी मान्यता की लालसा।
अस्वीकृति का डर।
अतीत की पीड़ा।
भविष्य की चिंता।
अज्ञानतापूर्ण जीवनशैली।

इनसे बचकर मन का दर्पण और साफ होता है।

7 मन के दर्पण को प्रतिदिन साफ रखने के उपाय

1 10 मिनट का ध्यान

मन शांत हो जाता है।

2 भावनात्मक डायरी

भावनाओं को लिखने से वे साफ दिखने लगती हैं।

3 हर रात आत्म-समीक्षा

पूरे दिन को मन के दर्पण में देखकर गलतियों और प्रगति को नोट करें।

4 मौन का अभ्यास

मौन मानसिक शोर को कम करता है।

5 प्रकृति से जुड़ना

प्रकृति मन का प्राकृतिक दर्पण है।

8 मन के दर्पण में स्वयं को देखने का आध्यात्मिक पहलू

भारतीय दर्शन, वेदांत, योग, उपनिषद सब कहते हैं कि- सच्चा ज्ञान तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति स्वयं को देखता है। धर्म या अध्यात्म बाहरी पूजा नहीं बल्कि अंतर की यात्रा है। मन का दर्पण ही आत्मा तक जाने का मार्ग है।

समापन- खुद को देखने की कला सीखिए

मन के दर्पण में स्वयं को देखना-

सरल भी है।
कठिन भी है।
सुखद भी है।
चुनौतीपूर्ण भी है।

पर यह एक ऐसी यात्रा है जो व्यक्ति को
सच्ची खुशीसच्ची शांति और सच्ची पहचान दिलाती है। जब दर्पण साफ होता है तो व्यक्ति दुनिया को नहीं, पहले खुद को बदलता है

और जो खुद को बदल लेता है वह अपने जीवन की दिशा बदल देता है।