क्यों हम खुद से दूर होते जाते हैं- एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
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स्वयं से मंथन करते हुए |
लेखक- बद्री लाल गुर्जर
भूमिका-
आज के समय में हम तकनीकी रूप से जुड़े हुए हैं लेकिन भावनात्मक रूप से अकेले। काम, सोशल मीडिया, संबंधों का दबाव, दौड़ती-भागती जिंदगी, तनाव, अपूर्ण इच्छाएँ और लगातार तुलना ने हमें खुद से ही काट दिया है।
बहुत से लोग कहते हैं- दिल खाली-खाली लगता है। मन में क्या चल रहा है खुद नहीं जानता। मैं पहले जैसा नहीं रहा। मेरे अंदर एक अलग व्यक्ति बैठा है जिसे मैं समझ नहीं पाता। इसे मनोविज्ञान में आत्म-वियोग कहा जाता है। यह लेख इसी जटिल प्रक्रिया का गहन विश्लेषण करता है।
1 आत्म-वियोग क्या है?
आत्म-वियोग तब होता है जब व्यक्ति-
अपनी भावनाओं को महसूस नहीं कर पाताअपने विचारों को पहचान नहीं पाता
अपनी इच्छाओं पर ध्यान नहीं दे पाता
अपने व्यक्तित्व से दूर हो जाता है
अपनी पहचान को लेकर भ्रमित हो जाता है
यह ऐसा अनुभव है जैसे आप अपने ही जीवन में दर्शक बन गए हों।
आत्म-वियोग की प्रमुख विशेषताएँ-
भावनात्मक सुन्नतामन में खालीपन
अपनी जरूरतों के प्रति अनभिज्ञता
निर्णय लेने में कठिनाई
जीवन में उद्देश्यहीनता
लगातार असंतोष
तनाव एक सामान्य स्थिति बन जाना
मन की यह दूरी धीरे-धीरे बनती है और व्यक्ति को इसका एहसास अक्सर तब होता है जब स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।
2 क्यों हम खुद से दूर होते जाते हैं? मनोवैज्ञानिक कारण
आइए इसे विभिन्न स्तरों पर समझें।
2.1 बचपन के अनुभव और दबी हुई भावनाएँ
मनोविज्ञान बताता है कि बचपन में-
भावनाओं को दबानामाता-पिता द्वारा उपेक्षा
लगातार आलोचना
दंड का डर
अपनी बात न कह पाने की आदत
भावनात्मक समर्थन न मिलना
इन सब कारणों से व्यक्ति अपने भावनात्मक स्व से दूर हो जाता है।
उदाहरण
यदि बचपन में बच्चा रोए और उसे कहा जाए- चुप रहो, रोते नहीं।
तो वह सीख जाता है कि भावनाएँ गलत हैं। यही आदत आगे चलकर उसे भावनाओं को दबाना सिखाती है।
2.2 सामाजिक तुलना
आज का समाज तुलना पर चलता है।
कौन ज्यादा कमाता है?किसके पास किस ब्रांड का फोन?
किसके पास कितने followers?
कौन कितना सुंदर?
यह लगातार तुलना व्यक्ति को मूल स्व से हटाकर बाहरी छवि पर केंद्रित कर देती है और जब इंसान बाहरी स्व में जीने लगता है तो वह असली मैं खो देता है।
2.3 डिजिटल ओवरलोड और सोशल मीडिया
फेसबुक, इंस्टाग्राम, रील्स, यूट्यूब…
हम दूसरों का जीवन देखते-देखते अपने जीवन से कट जाते हैं।
डिजिटल दुनिया तीन तरह से हमें खुद से दूर करती है:
ध्यान को भटकाकर- हम खुद को सुनते ही नहीं।झूठी तुलना करवाकर- दूसरों का संपादित जीवन हमें छोटे महसूस करवाता है।
डोपामिन की लत देकर- हम वास्तविक खुशी भूल जाते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य शोध कहते हैं कि लगातार स्क्रॉल करने से आत्म-जागरूकता कम होती है और व्यक्ति वास्तविकता से disconnect हो जाता है।
2.4 अत्यधिक व्यस्तता
बिजी होना आज गर्व की चीज़ बन गया है लेकिन अत्यधिक व्यस्तता मनोविज्ञान में एक प्रकार की भागदौड़ वाली बचाव रणनीति है। जब व्यक्ति अंदर झांकना नहीं चाहता वह खुद को काम में इतना डुबा देता है कि सोचने का समय ही न मिले।
यह खुद से भागने जैसा ही है।
2.5 दबी हुई इच्छाएँ और अपूर्ण सपने
कई बार हम-
समाजपरिवार
रिश्तों
नौकरी
पैसे
के दबाव में अपने सपनों को छोड़ देते हैं।
जब व्यक्ति वह जीवन नहीं जी रहा होता जिसे वह जीना चाहता है तो धीरे-धीरे वह अपने असली रूप से दूर हो जाता है।
2.6 भावनात्मक थकावट
लगातार तनाव संघर्ष रिश्तों की उलझनें व्यक्ति को भावनात्मक रूप से थका देती हैं।
भावनाएँ थक जाएँ तो मन disconnect होने लगता है।
इसे मनोविज्ञान में Emotional Burnout कहते हैं।
2.7 आत्म-जागरूकता की कमी
जब व्यक्ति-
ध्यानविचार
व्यवहार
प्रतिक्रिया
भावनाएँ
ये सब observe नहीं करता तब वह अपने आंतरिक स्व से दूर चला जाता है।
3 लक्षण- कैसे पता चले कि आप खुद से दूर हो रहे हैं?
1 खुद को खाली महसूस करना
मन में कोई स्पष्ट भावना नहीं रहती।
2 जीवन में उद्देश्य का अभाव
किस दिशा में जाना है, पता नहीं चलता।
3 निर्णय लेने में कठिनाई
क्योंकि व्यक्ति अपनी पसंद ही भूल चुका है।
4 दिमाग भारी लगना लेकिन कोई स्पष्ट विचार नहीं
5 लोगों के बीच रहने पर भी अकेलापन
6 जीवन में ऊर्जा का अभाव
7 खुद पर विश्वास कम होना
8 अजीब-सा सुन्नपन
अंदर एक शून्यता जिसे समझा नहीं जा सकता।
4 मनोवैज्ञानिक विश्लेषण- यह प्रक्रिया कैसे काम करती है?
यह पूरा आत्म-वियोग तीन चरणों में विकसित होता है:
4.1 पहला चरण- भावनात्मक दबाव
भावनाओं को महसूस करने से डर लगता है।
व्यक्ति उन्हें दूर धकेलता है।
4.2 दूसरा चरण- मानसिक दूरी बनना
जब भावनाएँ दबाई जाती हैं तो मन उनसे दूरी बना लेता है।
धीरे-धीरे मन और स्व के बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है।
4.3 तीसरा चरण- पहचान का संकट
व्यक्ति सोचने लगता है-
मैं कौन हूँ?
मैं क्या चाहता हूँ?
मेरी असल पहचान क्या है?
यह मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत पीड़ादायक स्थिति होती है।
5 कैसे फिर से खुद से जुड़ें? समाधान एवं उपाय
अब सबसे जरूरी प्रश्न- इस स्थिति से बाहर कैसे आएं?
5.1 रोज 10 मिनट आत्म-संवाद
एकांत में बैठकर खुद से पूछें-
मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ?मेरी असली ज़रूरत क्या है?
आज मुझे किस चीज़ ने परेशान किया?
यह अभ्यास आत्म-जागरूकता लौटाता है।
5.2 ध्यान
मनोविज्ञान के अनुसार ध्यान मन को स्थिर करता है और दबे हुए विचार सतह पर आते हैं।
यह आत्म-वियोग तोड़ने का शक्तिशाली तरीका है।
5.3 भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करें
डायरी लिखना जितना प्रभावी माना जाता है।
भावनाएँ स्पष्ट होती हैं।
5.4 सोशल मीडिया सीमित करें
दिन में कम से कम 2 घंटे डिजिटल ब्रेक रखें।
5.5 अपनी इच्छाओं को फिर से पहचानें
3 प्रश्न लिखें:
मैं क्या करना चाहता हूँ?मुझे किससे खुशी मिलती है?
मैं किस तरह का जीवन चाहता हूँ?
5.6 शरीर से जुड़ना
क्योंकि भावनाएँ पहले शरीर में प्रकट होती हैं-
पैरों में तनाव, छाती में दबाव, सिर में भारीपन।
इन्हें महसूस करना आत्म-जागरूकता बढ़ाता है।
5.7 अपनी सीमाएँ तय करें
जब हम ना कहना भूल जाते हैं तभी हम खुद से दूर हो जाते हैं।
5.8 पेशेवर मदद लेना
यदि मन बहुत भारी है तो मनोचिकित्सक से बात करना बेहद प्रभावी होता है।
6 जब हम खुद से जुड़ जाते हैं तो क्या बदलता है?
मन शांत होता हैनिर्णय स्पष्ट होते हैं
रिश्ते सुधरते हैं
आत्मविश्वास बढ़ता है
जीवन में खुशी लौटती है
उद्देश्य स्पष्ट होता है
मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है
सबसे बड़ी बात-
अंदर का खालीपन भर जाता है।
निष्कर्ष
हम खुद से दूर इसलिए होते जाते हैं क्योंकि-
भावनाओं को दबाते हैंदूसरों के अनुसार जीवन जीते हैं
डिजिटल दुनिया में खो जाते हैं
अंदर झांकने से डरते हैं
लेकिन अच्छी बात यह है कि खुद तक वापस लौटना हमेशा संभव है।
थोड़ा समय, थोड़ा धैर्य, थोड़ी जागरूकता और थोड़ी अंतर्दृष्टि-
बस इतना ही काफी है खुद को फिर से पाने के लिए।

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