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बाहरी शोर से भीतर की शांति तक की यात्रा

बाहरी शोर के बीच शांति से मनन करते हुए

बाहरी शोर के बीच शांति से मनन करते हुए

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

भूमिका-

आज का युग गति प्रतिस्पर्धा और कोलाहल का युग है। सुबह से लेकर रात तक इंसान किसी न किसी शोर में घिरा हुआ है कभी मोबाइल की घंटियाँ, कभी सड़क का ट्रैफिक, कभी समाचार चैनलों की बहसें तो कभी मन के भीतर चलने वाला विचारों का शोर। यह शोर केवल कानों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारी चेतना हमारे मानसिक संतुलन और हमारे जीवन की दिशा तक को प्रभावित करता है।

हम धीरे-धीरे इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शांति हमें असहज लगने लगी है। जब कोई बाहरी शोर नहीं होता, तब भीतर के विचारों की गूंज हमें बेचैन कर देती है। इसी बेचैनी से निकलने की यात्रा ही है  बाहरी शोर से भीतर की शांति तक की यात्रा।

1 शोर का मनोवैज्ञानिक प्रभाव-

शोर केवल ध्वनि नहीं है यह एक ऊर्जा है जो हमारी तंत्रिका प्रणाली को प्रभावित करती है। वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि लगातार शोर में रहने वाले लोगों में तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप अनिद्रा चिड़चिड़ापन चिंता और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।

लेकिन इससे भी गहरा असर है मन की थकान।
जब हम लगातार बाहरी शोर के बीच रहते हैं तो मन को आत्म-संवाद का अवसर नहीं मिलता। मनुष्य अपने भीतर झाँकना भूल जाता है। यही भूल उसे धीरे-धीरे भीतर की शांति से दूर कर देती है।

 2 शोर के प्रकार बाहरी और आंतरिक

हम जब शोर शब्द सुनते हैं तो दिमाग में तुरंत ध्वनि या आवाज़ की कल्पना करते हैं, परंतु शोर दो प्रकार का होता है-

बाहरी शोर 
ट्रैफिक का कोलाहल
मोबाइल नोटिफिकेशन
सोशल मीडिया की निरंतर जानकारी
भीड़ और लोगों की बातचीत
टीवी, विज्ञापन, संगीत आदि
2 आंतरिक शोर-
चिंता, भय, क्रोध
भविष्य की अनिश्चितता
आत्म-संदेह और नकारात्मक सोच
तुलना, असंतोष और अहंकार

अक्सर लोग केवल बाहरी शोर से बचने की कोशिश करते हैं लेकिन सबसे बड़ा शोर तो मन के भीतर पलता है। जब तक यह शांत नहीं होगा तब तक बाहरी मौन भी सच्चा मौन नहीं बन सकता।

3 भीतर की शांति का अर्थ-

भीतर की शांति का अर्थ यह नहीं कि आपके जीवन में कोई समस्या नहीं है बल्कि इसका अर्थ है  समस्याओं के बीच भी संतुलन बनाए रखना।
यह उस स्थिति का नाम है जब विचारों का प्रवाह नियंत्रित हो जाता है और आप अपने भीतर स्थिरता का अनुभव करते हैं।

शांति तब आती है जब व्यक्ति अपने विचारों का साक्षी बन जाता है न कि उनका दास।
यह वही अवस्था है जब आप स्वयं को सुनने लगते हैं न कि केवल दुनिया को।

4 भीतर की शांति की आवश्यकता क्यों?

आधुनिक जीवन में गति तो बहुत है पर दिशा का अभाव है।
हम हर समय कुछ करने में इतने व्यस्त हैं कि कुछ बनने की प्रक्रिया से कट गए हैं।
इस कटाव ने ही हमारे भीतर खालीपन और असंतोष को जन्म दिया है।

भीतर की शांति के बिना-

निर्णय लेने की क्षमता घटती है
रिश्ते कमजोर होते हैं
मन विचलित रहता है
जीवन में आनंद का भाव खो जाता है

जब मन शांत होता है तब बुद्धि स्पष्ट होती है।
स्पष्टता ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।

5 मौन की शक्ति

मौन केवल शब्दों की अनुपस्थिति नहीं बल्कि एक गहरी उपस्थिति है।
महान संतों, योगियों और चिंतकों ने मौन को परम संवाद कहा है।

जब व्यक्ति मौन में प्रवेश करता है तो वह बाहरी कोलाहल से मुक्त होकर आत्मा की भाषा को सुनता है।
मौन हमें सिखाता है-

विचारों की भीड़ से निकलकर केंद्र में आना
प्रतिक्रियाओं से पहले उत्तरदायी बनना
दूसरों की बात को गहराई से सुनना

मौन साधना का अर्थ है-
शब्दों से नहीं, अनुभवों से बोलना।

6 अंतर्दर्शन- भीतर की ओर यात्रा

अंतर्दर्शन वह क्षण है जब मनुष्य अपनी आँखें बाहर से हटाकर भीतर की ओर मोड़ देता है।
यह आत्मा के दर्पण में स्वयं को देखने की प्रक्रिया है।

इस यात्रा में व्यक्ति प्रश्न करता है-
मैं वास्तव में कौन हूँ?
क्या मैं वही हूँ जो दुनिया मुझे कहती है या कुछ और?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें आत्म-जागरूकता की ओर ले जाते हैं।
और आत्म-जागरूकता ही भीतर की शांति का द्वार है?

7 ध्यान- मन की शांति की चाबी

ध्यान भीतर की शांति तक पहुँचने का सबसे सरल और प्रभावी साधन है।
ध्यान का अर्थ है-
वर्तमान क्षण में पूर्ण रूप से उपस्थित होना।

ध्यान हमें सिखाता है कि हम विचारों को रोकें नहीं बस उन्हें देखें।
धीरे-धीरे देखने की यह प्रक्रिया मन को शांत और स्थिर बना देती है।

ध्यान के लाभ-

मानसिक स्पष्टता
तनाव और चिंता में कमी
भावनात्मक संतुलन
नींद में सुधार
आत्म-स्वीकृति और करुणा में वृद्धि

8 प्रकृति-

प्रकृति हमें मौन का अर्थ सिखाती है।
पेड़ों की सरसराहट नदियों की धारा पर्वतों की स्थिरता ये सब भीतर की शांति की झलक हैं। जब हम प्रकृति के सान्निध्य में होते हैं, तो हमारा मन स्वतः शांत होने लगता है। प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि शांति प्रयास से नहीं, स्वीकृति से आती है। जैसे वृक्ष बिना बोले छाया देता है वैसे ही शांति बिना शब्दों के हमें गले लगाती है।

9 डिजिटल शोर से मुक्ति-

आज के युग में सबसे बड़ा शोर है- डिजिटल शोर।
मोबाइल, नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और निरंतर स्क्रीन टाइम ने मन को अशांत बना दिया है।

डिजिटल डिटॉक्स जरूरी है।
हर दिन कुछ घंटे मोबाइल से दूर रहना, सोशल मीडिया सीमित करना और डिजिटल मौन अपनाना भीतर की यात्रा को आसान बनाता है। आप पाएँगे कि जब स्क्रीन शांत होती है तो मन बोलने लगता है।

10 आत्म-स्वीकृति-

भीतर की शांति तब तक संभव नहीं जब तक हम स्वयं को स्वीकार नहीं करते। अधिकांश लोग अपने ही विचारों इच्छाओं और कमियों से संघर्ष करते रहते हैं। यह संघर्ष मन में द्वंद्व पैदा करता है।

आत्म-स्वीकृति का अर्थ है-
मैं जैसा हूँ उसे बिना अपराधबोध के स्वीकार करना।

जब यह स्वीकृति आती है तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाता है और मन सहज रूप से शांत हो जाता है।

11 साधारण जीवन में शांति के उपाय-

प्रत्येक दिन 10 मिनट मौन में बैठें।
सुबह उठते ही मोबाइल न देखें।
धीरे-धीरे खाएँ हर निवाले का स्वाद लें।
किसी वृक्ष या पौधे से बात करें।
रात को सोने से पहले कृतज्ञता प्रकट करें।
दिनभर में 3 बार गहरी साँस लेकर रुकें और स्वयं को महसूस करें।

ये छोटे अभ्यास धीरे-धीरे आपके भीतर स्थिरता और शांति भर देंगे।12 शांति की सामाजिक उपयोगिता-

भीतर का शांत व्यक्ति समाज के लिए वरदान होता है।
उसका व्यवहार संयमित, निर्णय स्पष्ट और दृष्टि करुणामयी होती है।
ऐसे व्यक्ति जहाँ जाते हैं वहाँ एक अदृश्य ऊर्जा फैलती है जो दूसरों को भी शांति का अनुभव कराती है।

शांति का प्रसार भीतर से बाहर की ओर होता है।
इसलिए कहा गया है-
जो स्वयं शांत है वही संसार को शांत कर सकता है।

13 जब भीतर मौन गूंजने लगता है-

जब व्यक्ति इस यात्रा में आगे बढ़ता है, तो उसे एक गहरी अनुभूति होती है।
मौन अब खाली नहीं लगता बल्कि जीवंत लगता है।
भीतर एक संगीत बजने लगता है बिना शब्दों का बिना लय का परंतु बेहद मधुर।
यही वह क्षण है जब आत्मा और चेतना एकाकार हो जाती है।

निष्कर्ष-

मैंने इस लेख में देखा कि बाहरी शोर केवल वातावरण में नहीं हमारे मन में भी है।
इससे मुक्ति पाने के लिए हमें बाहर की नहीं भीतर की यात्रा करनी होती है।
ध्यान, मौन, अंतर्दर्शन और आत्म-स्वीकृति इस यात्रा के चार मुख्य स्तंभ हैं।

जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तो दुनिया का शोर उसे डिगा नहीं पाता।
वह जान जाता है कि शांति कोई लक्ष्य नहीं बल्कि जीवन जीने की अवस्था है।

बाहरी शोर को शांत करने से पहले भीतर के शोर को सुनो- वही तुम्हें सच्ची शांति की राह दिखाएगा।