अज्ञान से आत्म-प्रकाश की ओर एक यात्रा

आत्म प्रकाश के लिए साधना करते हुए

आत्म प्रकाश के लिए साधना करते हुए

लेखक- बद्री लाल गुर्जर

1 प्रस्तावना

मनुष्य का जीवन आरंभ से ही ज्ञान की खोज का प्रतीक रहा है। जब तक वह अपने अस्तित्व के अर्थ को नहीं समझता, तब तक उसका जीवन अंधकारमय रहता है।
अज्ञान वह स्थिति है जब व्यक्ति स्वयं को बाहरी वस्तुओं परिस्थितियों और सीमाओं के भीतर बाँध लेता है।
वह यह भूल जाता है कि उसके भीतर एक ऐसी रोशनी छिपी है जो सभी अंधकारों को मिटा सकती है यह रोशनी है आत्म-प्रकाश, जो आत्मज्ञान से प्रकट होती है।

अज्ञान में जीने वाला व्यक्ति भ्रम, भय और असंतोष से ग्रस्त रहता है। उसे अपने दुखों का कारण बाहरी दुनिया में दिखाई देता है जबकि उसकी जड़ें उसके भीतर के अज्ञान में होती हैं।

अज्ञान कोई पाप नहीं, यह केवल अनदेखा सत्य है। जैसे अंधकार को दूर करने के लिए दीपक जलाना पड़ता है वैसे ही अज्ञान को मिटाने के लिए ज्ञान और जागरूकता का दीपक जलाना पड़ता है।

2 अज्ञान की प्रकृति-

अज्ञान कोई बाहरी चीज़ नहीं यह स्वयं के प्रति विस्मृति की अवस्था है।
जब व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह कौन है तब वह वस्तुओं, पद, प्रतिष्ठा और संबंधों में अपनी पहचान ढूँढने लगता है।

अज्ञान आत्मा की आँखों पर बंधी पट्टी है जिसे हटाने पर ही सत्य दिखाई देता है।

अज्ञान की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं-

  1. अहंकार का बढ़ना- मैं और मेरा की सीमाओं में बंध जाना।
  2. भ्रमित दृष्टि चीज़ों को वैसे न देख पाना जैसी वे वास्तव में हैं।
  3. अशांति- जब मन सत्य से कट जाता है तो भीतर का संतुलन टूट जाता है।
  4. भय और असुरक्षा- अज्ञानी व्यक्ति बाहरी सहारे ढूँढता है क्योंकि उसे अपने भीतर का सहारा नहीं मिला होता।

3 ज्ञान का उदय-

जैसे रात के अंधेरे को एक किरण मिटा देती है वैसे ही जीवन के अंधकार को आत्मज्ञान का एक क्षण दूर कर सकता है।
ज्ञान का आरंभ तब होता है जब मनुष्य प्रश्न करना शुरू करता है- मैं कौन हूँ? मेरा उद्देश्य क्या है? मैं दुखी क्यों हूँ?

यही अंतर्दर्शन का प्रारंभ है।
जब व्यक्ति अपने भीतर झाँकने लगता है तब उसे यह ज्ञात होता है कि जो कुछ वह बाहर ढूँढ रहा था वह सब उसके भीतर पहले से विद्यमान है।

4 आत्म-ज्ञान की यात्रा-

आत्म-ज्ञान कोई बाहरी अध्ययन नहीं यह भीतर की यात्रा है।
यह यात्रा कठिन अवश्य है परंतु संभव है जब व्यक्ति साहसपूर्वक अपने भीतर के अंधकार का सामना करता है।

इस यात्रा की कुछ महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं-

  1. स्वीकार्यता- स्वयं को जैसे हैं वैसे स्वीकारना।
  2. अवलोकन- अपने विचारों, प्रतिक्रियाओं और भावनाओं का साक्षी बनना।
  3. अंतर्दर्शन- अपने भीतर के कारणों की खोज करना।
  4. समझ- जो देखा और जाना उसे सही रूप में समझना।
  5. आत्म-साक्षात्कार-  यह अनुभव कि मैं शरीर या मन नहीं, बल्कि चेतना हूँ।

यह क्रम धीरे-धीरे व्यक्ति को अज्ञान से मुक्त करता है और उसे आत्म-प्रकाश की ओर ले जाता है।

5 आत्म-प्रकाश का अर्थ-

जब व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करता है तब उसके भीतर एक ऐसी ज्योति जलती है जो कभी बुझती नहीं।
यह प्रकाश बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक है यह चेतना की उजास है।

आत्म-प्रकाश का अर्थ है-

  • सत्य को बिना विकार के देखना।
  • अपने कर्मों के प्रति सजग रहना।
  • दूसरों में भी उसी चेतना को पहचानना जो अपने भीतर है।
  • अहंकार, भय और द्वेष से ऊपर उठना।
  • जीवन को एक साधना के रूप में जीना।

6 आत्म-प्रकाश से जीवन में आने वाले परिवर्तन

जब व्यक्ति आत्म-प्रकाश को प्राप्त करता है तो उसके जीवन में निम्न परिवर्तन आते हैं —

  1. शांति और संतुलन- मन की बेचैनी समाप्त हो जाती है।
  2. निर्मलता- विचार और व्यवहार दोनों पवित्र हो जाते हैं।
  3. सत्यनिष्ठा- व्यक्ति अपने कर्मों में ईमानदारी अपनाता है।
  4. करुणा- दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम बढ़ता है।
  5. आनंद की अनुभूति- बाहरी सुख पर निर्भरता समाप्त होकर आनंद भीतर से उत्पन्न होता है।

यह अवस्था ही आत्म-प्रकाश की पूर्णता है जब व्यक्ति बाहर नहीं भीतर जीता है।

7 अज्ञान से मुक्ति के उपाय-

अज्ञान से निकलने के लिए किसी विशेष धर्म या पंथ की आवश्यकता नहीं बल्कि जागरूकता की आवश्यकता है।
निम्न उपाय आत्म-प्रकाश की यात्रा को सरल बना सकते हैं-

  1. ध्यान- मन को स्थिर कर आत्मा की शांति को महसूस करना।
  2. सत्संग- ज्ञानी जनों की संगति से दृष्टि निर्मल होती है।
  3. पठन-पाठन- गीता, उपनिषद, बौद्ध ग्रंथ या आत्मज्ञान विषयक पुस्तकों का अध्ययन।
  4. निष्काम सेवा- बिना स्वार्थ के सेवा करना आत्म-शुद्धि का श्रेष्ठ मार्ग है।
  5. मौन और आत्म-संवाद- हर दिन कुछ समय अपने भीतर संवाद करना।

8 आत्म-प्रकाश और आधुनिक जीवन

आज का युग तकनीक और भौतिकता का युग है।
मनुष्य बाहर की सुविधाओं में डूब गया है पर भीतर से रिक्त है।
तनाव, अवसाद, प्रतियोगिता और असंतोष की जड़ यही अज्ञान है।
इसलिए आज सबसे बड़ा आवश्यक ज्ञान वही है जो अपने भीतर की शांति को पुनः जागृत करे।

जब व्यक्ति आत्म-प्रकाश को अपनाता है तो-

  • वह तकनीक का दास नहीं उसका उपयोगकर्ता बनता है।
  • वह भीड़ में रहते हुए भी अकेला नहीं महसूस करता।
  • वह हर परिस्थिति में संतुलित रहता है।

आधुनिक युग में आत्मज्ञान ही मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक सामंजस्य और शांति का आधार है।

9 अंतर्दर्शन-

अंतर्दर्शन वह दर्पण है जिसमें आत्मा अपना वास्तविक रूप देख सकती है।
जब हम अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बिना पक्षपात देखना शुरू करते हैं तब भीतर का प्रकाश बढ़ने लगता है।

अंतर्दर्शन आत्मा की आँख है और आत्म-प्रकाश उसका दर्शन।

इसलिए आत्म-प्रकाश की यात्रा का प्रथम कदम है स्वयं को जानने की जिज्ञासा

10 निष्कर्ष-

अज्ञान से आत्म-प्रकाश की यह यात्रा किसी एक दिन की नहीं बल्कि जीवनभर चलने वाली साधना है।
हर दिन हर परिस्थिति में हम स्वयं को थोड़ा और जान सकते हैं।
जब हम स्वयं को पूरी तरह पहचान लेते हैं तब संसार बदल जाता है क्योंकि देखने वाला बदल गया है।

अज्ञान हमें बाँधता है आत्म-प्रकाश हमें मुक्त करता है।
यही मुक्ति है, यही शांति है, यही सत्य है।